Showing posts with label ಅಷಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ. Show all posts
Showing posts with label ಅಷಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ. Show all posts

Sunday, 14 May 2023

कृतार्थोऽनेन ज्ञानेन

अष्टावक्र गीता

अध्याय १७

श्लोक ८

कृतार्थोऽनेनज्ञानेनेत्येवं गलितधीःकृती।।

पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्नश्ननास्ते यथासुखम्।।८।।

(कृतार्थः अनेन ज्ञानेन इति एवं गलितधीःकृती। पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् आस्ते यथासुखम्।।)

अर्थ : इसी (पिछले श्लोक ७ में कहे गए अनुसार ज्ञान को प्राप्त और उस पर आश्रित ज्ञानी) ज्ञान के कारण लौकिक बुद्धि और कर्म आदि के विगलित हो जाने से दूसरों की तरह देखता, छूता, सूँघता, सुनता और खाता पीता हुआ सुख से रहता है।

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೭

ಶ್ಲೋಕ ೮

ಕೃತಾರ್ಥೋऽನೇನ ಜ್ಞಾನೇನೇ-

ತ್ಯೇವಂ ಗಲಿತಧೀಃಕೃತೀ||

ಪಶ್ಯನ್ ಶೃಣ್ವನ್ ಸ್ಪೆಶನ್

ಜಿಘೃನ್ನಶ್ನನ್ನ್ನಾಸ್ತೇ ಯಥಾಸುಖಮ್||೮||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 17

Stanza 8

Being fulfilled by this Knowledge (Jnana, as is described in the last stanza 7) and with his mind absorbed in this Knowledge (JnAna), and contented,  the wise one lives happily, seeing, hearing, touching, smelling and eating.

***

Friday, 28 April 2023

आयासात्सकलो दुःखी

अष्टावक्र गीता 

अध्याय १६

श्लोक ३

आयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन।।

अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्ननोति निर्वृतिम्।।३।।

(आयासात् सकलः दुःखी न एनं जानाति कश्चन। अनेन एव उपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम्।।)

अर्थ  : हर कोई, प्रत्येक ही दुःखी है, क्योंकि कोई भी यह नहीं जानता कि यत्न करना ही दुःख का कारण है। जबकि बिरला कोई धन्य है जो इसे जानकर शान्त और कृतकृत्य हो जाता है, उसके लिए  कुछ करने या न करने का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है।

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೬

ಶ್ಲೋಕ ೩

ಆಯಾಸಾತ್ಸಕಲೋ ದುಃಖೀ

ನೈನಂ ಜಾನಾತಿ ಕಶ್ಚನ||

ಅನೇನೈವೋಪದೇಶೇನ

ದನ್ಯಃ ಪ್ರಾಪ್ನೋತಿ ನಿರ್ವೃತಿಂ||೩||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 16

Stanza 3

All are unhappy because they exert them-selves. And one knows this (secret). But The Blessed one attains emancipation through this very instruction.

***

Thursday, 6 April 2023

क्व धनानि क्व मित्राणि

अष्टावक्र गीता

अध्याय १४

श्लोक २

क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः।।

क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा।।२।।

(क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषय-दस्यवः। क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा।।)

अर्थ : अब, जब मेरी स्पृहा / कामना ही गलकर नष्ट हो चुकी है, तो इन धन-सम्पत्तियों, मित्रों, विभिन्न विषय-रूपी दस्युओं, और शास्त्रों एवं शास्त्रों के ज्ञान से भी, मुझे क्या प्रयोजन है!  

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೪

ಶ್ಲೋಕ ೨

ಕ್ವ ಧನಾನಿ ಕ್ವ ಮಿತ್ರಾಣಿ

ಕ್ವ ಮೇ ವಿಷಯಧಸ್ಯವಃ||

ಕ್ವ ಶಾಸ್ತ್ರಂ ಕ್ವ ಚ ವಿಜ್ಞಾನಂ

ಯದಾ ಮೇ ಗಲಿತಾ ಸ್ಪೃಹಾ||೩||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 14

Stanza 2

When my desire has melted away, where are my riches, where my friends and the robbers in the form of the sense-objects, and where are scripture and knowledge.

*** 

Thursday, 23 February 2023

पश्य भूतविकारांस्त्वं

अष्टावक्र गीता

अध्याय ९

श्लोक ७

पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान्यथार्थतः।।

तत्क्षणात्बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि।।७।।

(पश्य भूतविकारान् त्वं भूतमात्रानि यथार्थतः। तत्-क्षणात् बन्ध-निर्मुक्तः स्वरूपस्थः भविष्यसि।।)

अर्थ : इन भूतों के विकारों को तुम भूतमात्र की तरह से ही देखो (न कि घटनाक्रम या परिवर्तनशीलता की तरह) और इस प्रकार से देखते ही तुम उसी क्षण बन्धन से पूर्णतः मुक्त हो अपने नित्य और निज स्वरूप में स्थित हो जाओगे।

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೯

ಶ್ಲೋಕ ೮

ಪಶ್ಯ ಭೋತವಿಕಾರಾನ್ಸ್ ತ್ವಂ

ಭೋತಮಾತ್ರಾನ್ಯಥಾರಥತಃ||

ತತ್ಕ್ಷಣಾತ್ಬನ್ಧನಿರ್ಮುಕ್ತಃ

ಸ್ವರೋಪಸ್ಥೋ ಭವಿಷ್ಯಸಿ||೭||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 9

Stanza 7

Look upon the modifications of the elements as nothing in reality, but the primary elements themselves and you will at once be free from bondage and abide in your true self.

***


कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं

अष्टावक्र गीता

अध्याय ९

श्लोक ६

कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः।।

निर्वेदसमता युक्त्या यस्तारयति संसृतेः।।६।।

(कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः। निर्वेदसमता युक्त्या यः तारयति संसृतेः।।)

अर्थ  : निर्वेद और समत्व की युक्ति से जिसने चैतन्य को व्यक्त और अव्यक्त इन दोनों प्रकारों में जान लिया है, और जो संसार से सबका उद्धार कर सबको तार देता है, क्या वह गुरु ही नहीं है!

(इसे तीन भिन्न अर्थों में ग्रहण किया जा सकता है। एक अर्थ तो यह है कि ऐसा कोई भी मनुष्य वस्तुतः गुरुतुल्य है, दूसरा यह कि गुरु ही संसार में सबका उद्धार करने और सबको तारने के लिए ऐसे मनुष्य के रूप में अवतरित होता है। इसका तीसरा यह अर्थ यह भी ग्रहण किया जा सकता है कि चैतन्य ही एकमात्र गुरु है जो भिन्न भिन्न और अनेक मूर्तियों में प्रकट है। 

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೯

ಶ್ಲೋಕ ೬

ಕೃತ್ವಾ ಮೂರ್ತಿಪರಿಜ್ಞಾನಂ

ಚೈತನ್ಯಸ್ಯ ನ ಕಿಂ ಗುರುಃ||

ನಿರ್ವೇದಸಮತಾ ಯುಕ್ತ್ಯಾ

ಯಸ್ತಾರಯತಿ ಸಂಸೃತೇಃ||೬||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 9

Stanza 6

He, who by means of complete indifference to the world, equanimity and the reasoning, gains a knowledge of the true nature of the Transcendental Intelligence / Consciousness, and saves others from the world,  - Is he not really the spiritual guide?

***

Sunday, 19 February 2023

कोऽसौ कालो वयः

अष्टावक्र गीता

अध्याय ९

श्लोक ४

कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम्।।

तान्युपेक्ष्य यथा प्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात्।।४।।

(कः असौ कालः वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि न उ नृणाम्। तानि उपेक्ष्य यथा प्राप्तवर्ती सिद्धिं अवाप्नुयात्।।) 

अर्थ : ऐसा कौन सा समय होता है या आयु होती है जब मनुष्यों को कोई न कोई द्वन्द्व नहीं होता! अर्थात् ऐसा कभी नहीं होता कि मनुष्य द्वन्द्वों से रहित हो सके। इस स्थिति में यही उचित है कि उन सभी द्वन्द्वों की उपेक्षा करते हुए जो भी प्राप्त या अप्राप्त होता है, वह उससे संतुष्ट और अप्रभावित रहे।

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೯

ಶ್ಲೋಕ ೪

ಕೋऽಸೈ ಕಾಲೋ ವಯಃ ಕಿಂ ವಾ

ಯತ್ರ ದ್ಪನ್ದ್ವಾನಿ  ನಿನಿ ನೋ ನೃಣಾಂ||

ತಾನ್ಯುಪೇಕ್ಷ್ಯ ಯಥಾಪ್ರಾಪ್ತ-

ವರ್ತೀ ಸಿದ್ಧಿಮವಾಪ್ನುಯಾತ್||೪||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 9

Stanza 4

What is that time or age (in the life) in which the pairs of opposites don't exist for men! (-- There is never such a time in life). One who is content with whatever comes of itself, and quits these (pairs of these opposites) attains peace / perfection ultimate.

***


Tuesday, 14 February 2023

कस्यापि तात धन्यस्य

अष्टावक्र गीता

अध्याय ९

श्लोक २

कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।।

जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गताः।।२।।

(कस्य अपि तात धन्यस्य लोकचेष्टा-अवलोकनात्।

जीवित-इच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सा उपशमं गताः।।)

अर्थ : हे तात! कोई कोई ही ऐसा भाग्यवान होता है, जिसकी जीते रहने की, उपभोग करते रहने की, और (लौकिक) ज्ञान प्राप्त करते रहने की इच्छाएँ, विविध सांसारिक क्रिया-कलापों का अवलोकन करने से शान्त हो जाती हों। बिरला ही मनुष्य ऐसा होता है जो कि इस प्रकार से संसार से उपरत होता हो।

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೯

ಶ್ಲೋಕ ೨

ಕಸ್ಯಾಪಿ ತಾತ ಧನ್ಯಸ್ಯ 

ಲೋಕಚೇಷ್ಟಾವಲೋಕನಾತ್||

ಜೀವಿತೇಚ್ಛಾ ಬುಭುಕ್ಷಾ ಚ

ಬುಭುತ್ಸೋಪಶಮಂ ಗತಾಃ||೨||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 9

Stanza 2

My Child! Who is that blessed person whose desires to live, to enjoy and to know have been extinguished by observing the ways of men?

***

 

Saturday, 28 January 2023

अहो चिन्मात्रमेवाहम्

अष्टावक्र गीता

अध्याय ७

श्लोक ५

अहो चिन्मात्रमेवाहमिन्द्रजालोपमं जगत्।।

अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना।।५।।

(अहो चित् मात्रं एव अहं इन्द्रजालोपमं जगत्। अतः मम कथं कुत्र हेय-उपादेय-कल्पना।।

अर्थ : अहो! वस्तुतः मैं चैतन्य आत्मा चिन्मात्र हूँ। और जगत्  चूँकि इन्द्रजाल की तरह माया ही है, अतः मेरे लिए जगत् को त्यागनेअथवा स्वीकार करने का प्रश्न ही कहाँ उठता है!

||इति सप्तमोऽध्यायः||

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೭

ಶ್ಲೋಕ ೫

ಅಹೋ ಚಿನ್ಮಾತ್ರಮೇವಾಹ-

ಮಿನ್ದ್ರಜಾಲೋಪಮಂ ಜಗತ್||

ಅತೋ ಮಮ ಕಥಂ ಕುತ್ರ

ಹೇಯೋಪಾದೇಯಕಲ್ಪನಾ||೫||

||ಇತಿ ಸಪ್ತಮಾಧ್ಯಾಯಃ||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 7

Stanza 5

Oh,  I am really Intelligence itself. The world is like a juggler's show. So how and where can there be any thought of rejection and acceptance in me! 

Thus concludes chapter 7 of this text :

Ashtavakra Gita. 

--



Monday, 23 January 2023

मय्यनन्तमहाम्भोधौ

अष्टावक्र गीता
अध्याय ७
श्लोक १
जनक उवाच :
मय्यनन्तमहाम्भोधौ* विश्वपोत इतस्ततः।।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता।।१।।
(मयि अनन्त महा अम्भुधौ / अम्बुधौ विश्वपोतः इतस्ततः।  भ्रमति स्वान्त-वातेन न मम अस्ति असहिष्णुता।।)
अर्थ :
मुझ आत्मारूपी महासमुद्र में विश्वरूपी अनेक पोत यहाँ वहाँ उनकी अपनी शक्ति से वायु की भाँति भ्रमण करते हैं। उनके इस कार्य के प्रति मुझमें कोई असहिष्णुता नहीं है।
*पाठान्तर -- महाम्बोधौ। 
--
ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ
ಸಪ್ತಮಾಧ್ಯಾಯಃ
ಶ್ಲೋಕ ೧
ಜನಕ ಉವಾಚ --
ಮಯ್ಯನನ್ತಮಹಾಮ್ಭೋಧೌ ವಿಶ್ವಪೋತ ಇತಸ್ತತಃ ||
ಭ್ರಮತಿ ಸ್ವಾನ್ತವಾತುನ ನ ಮಮಾಸ್ಯಸಹಿಷ್ಣುತಾ||೧||
--
Ashtavakra Gita
Chapter 7
Stanza 1
Janaka said :
In me, -the boundless ocean, the ark of the universe moves hither and thither, impelled by the wind of its own nature. But I am not impatient.

***

 

Monday, 16 January 2023

प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद्

अष्टावक्र गीता

अध्याय  ५

श्लोक ३

प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद्विश्वं नास्त्वमले त्वयि।।

रज्जु सर्प-इव व्यक्तमेवमेवलयं व्रज।।३।।

(प्रत्यक्षं अपि अवस्तुत्वात् विश्वं नास्ति अमले त्वयि । रज्जुः सर्प इव व्यक्तं एवमेव लयं व्रज।।) 

अर्थ : रज्जु में सर्प के होने का आभास होने से रज्जु वस्तुतः सर्प नहीं हो जाती, और रज्जु को "यह सर्प नहीं, रज्जु है" इस तरह से जानते ही सर्प (का आभास) विलीन हो जाता है।  निर्मल आत्मा में जगत् का आभास भी ऐसी ही मिथ्या प्रतीति है यह भान होते ही आभासी जगत् विलीन हो जाता है। इसी तरह अपने निर्मल स्वरूप को जानकर उसमें निमग्न हो जाओ।

--

ಅಷಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೫

ಶ್ವೇತ ೩

ಪೃತ್ಯಕ್ಷಮಪಿ ವಸ್ತುತ್ವಾದ್ವಿಶ್ವಂ ನಾಸ್ತ್ಯಮಲೇ ತ್ವಯಿ||

ರಜ್ಜುಸರ್ಪ ಇವ ವ್ಯಕ್ತಮೆವಮೇವ ಲಯಂ ವ್ರಜ||೩||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 5

Stanza 3

The universe being manifested like the snake in the rope, does not exist in you who are pure, even though it is present to the senses; because it is unreal. (Knowing this,) Thus verily do you enter into (the state of) dissolution.

***

 


 

Wednesday, 11 January 2023

आत्मानमद्वयं कश्चित्

अष्टावक्र गीता

अध्याय ४

श्लोक ६

आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम्।।

यद्वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्।।६।।

(आत्मानं अद्वयं कश्चित् जानाति जगदीश्वरम्। यत् वेत्ति तत् सः कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्।।) 

अर्थ : अपनी द्वैतरहित निज और नित्य आत्मा को ही जगत् का एकमात्र ईश्वर जाननेवाला कोई ही जगत् के स्वामी को जानता है । जो इस प्रकार तत्त्वतः जानता है, वह इसी विवेक* से प्रेरित होकर समस्त आचरण करता है, उसे भी कहीं भी, किसी से भी  कभी कोई भय नहीं होता।

।। इति चतुर्थोऽध्यायः।।

--

*अद्वैत-निष्ठा :

ईश्वरो गुरु आत्मेति मूर्तिभेदाविभागिने। 

व्योमवद्व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः।। 

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೪

ಶ್ಲೋಕ ೬

ಆತ್ಮಾನಮದ್ವಯಂ ಕಶ್ಚಿ-

ಜ್ಜಾನಾತಿ ಜಗದೀಶ್ವರಂ||

ಯದ್ವೇತ್ತಿ ತತ್ ಸ ಕುರುತೇ

ನ ಭಯಂ ತಸ್ಯ ಕುತ್ರಚಿತ್||೬||

||ಇತಿ ಚತುರ್ಥೊऽಧ್ಯಾಯಃ||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 4

Stanza 6

Rare is the man who knows himself as one without a second as well as the Lord of the universe. He does what he knows and has no fear from any quarter.

Thus concludes chapter 4 of :

The Ashtavakra Gita.

***



Saturday, 7 January 2023

यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः

अष्टावक्र गीता

अध्याय ४

श्लोक २

यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवता।।

अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति।।२।।

(यत् पदं प्रेप्सवः दीनाः शक्र आद्याः सर्वदेवता। अहो तत्र स्थितः योगी न हर्षं उपगच्छति।।)

अर्थ : उस (परम) पद को प्राप्त करने के लिए, जिसे प्राप्त करने के लिए इन्द्र इत्यादि सारे देवता भी लालायित होते हैं, और उसे प्राप्त न कर पाने से दुःखी अनुभव करते हैं, वहाँ पर अनायास ही स्थित हुआ योगी सुख या दुःख आदि से उदासीन रहते हुए, किसी हर्ष आदि से भी रहित होता है।

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ 

ಅಧ್ಯಾಯ ೪

ಶ್ಲೋಕ ೨

ಯತ್ಪದಂಪ್ರೇಪ್ಸವೋ ದಿನಾಃ

ಶಕ್ರಾದ್ಯಾಃ ಸರ್ವದೇವತಾಃ||

ಅಹೋ ತತ್ರ ಸ್ಥಿತೋ ಯೋಗೀ

ನ ಹರ್ಷಮುಪಗಚ್ಛತಿ ||೨||

--

Oh, the Yogi does not feel elated abiding in that position which Indra and all other gods hanker after and become unhappy.

***

Friday, 6 January 2023

हन्तात्मज्ञस्य धीरस्य

अष्टावक्र गीता

अध्याय ४

श्लोक १

अष्टावक्र उवाच --

हन्तात्मज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।।

न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता।।१।।

(हन्त आत्मज्ञस्य धीरस्य खेलतः भोगलीलया। न हि संसारवाहीकैः मूढैः सह समानता।।)

अर्थ : अष्टावक्र ने कहा :

अब, उस आत्मज्ञ धीर के आचरण के बारे में, जो कि अनायास भोगों, लीलाओं आदि में रमता प्रतीत होता है। किसी दूसरे और सांसारिक मूढ से उसकी कोई समानता कदापि नहीं हो सकती।

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೪

ಶ್ಲೋಕ ೧

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಉವಾಚ :

ಹನ್ತಾತ್ಮಜ್ಞಸ್ಯ ಧೀರಸ್ಯ ಖೇಲತೋ ಭೋಗಲೀಲಯಾ||

ನ ಹಿ ಸಂಸಾರವಾಹೀಕೈರ್ಮೂಢೈಃ ಸಹಸಮಾನತಾ||೧||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 4

Stanza 1

Ashtavakra said :

Oh! The intelligent minded one, -the knower of Self plays the game of enjoyment, has no similarity to the deluded beasts of the world.

***


Wednesday, 28 December 2022

आस्थितं परमाद्वैतम्

अष्टावक्र गीता

अध्याय ३

श्लोक ६

आस्थितं परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः।।

आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया।।६।।

अर्थ : यह आश्चर्य ही है कि कोई परम अद्वैत में प्रतिष्ठित रहते हुए भी और मोक्षप्राप्ति के लिए तत्पर और सुव्यवस्थित होकर भी कामविह्वल होकर शृङ्गार-भावना में पूरी तरह निमग्न हो!

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ 

ಅನ್ಯಾಯ ೩

ಶ್ಲೋಕ ೬

ಆಸ್ಥಿತಃ ಪರಮಾದ್ವೈತಂ ಮೋಕ್ಷಾರ್ಥೇऽಪಿ ವ್ಯವಸ್ಥಿತಃ||

ಆಶ್ಚರ್ಯಂ ಕಾಮವಶಗೋ ವಿಕಲಃ ಕೆಲಿಶಿಕ್ಷಯಾ ||೬||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 3

Stanza 6

--

Strange indeed! Abiding in the Supreme non-duality and intent on liberation, one should yet be subject to lust and be unsettled by the practice of amorous pastimes!

***


Tuesday, 29 November 2022

बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः

अष्टावक्र गीता

अध्याय २

श्लोक १७

बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया।।

एवं विमृशतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम।।१७।।

(बोधमात्रः अहं अज्ञानात् उपाधिः कल्पितः मया। एवं विमृशतः नित्यं निर्विकल्पे स्थितिः मम।)

अर्थ : 

यद्यपि अहं (मैं)- आत्मा बोधमात्र है, अज्ञानवश मेरे द्वारा उपाधि कल्पित कर ली जाती है (और प्रमादवश अपने आपको उपाधि मान लिया जाता है)। और जब इस पर ध्यानपूर्वक विमर्श किया जाता है तो पाया जाता है कि मेरा वास्तविक स्वरूप तो नित्य और निर्विकल्प है। 

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೨

ಶ್ಲೋಕ ೧೭

ಬೋಧಮಾತ್ರೋऽಹಮಜ್ಞಾಲಾ-

ದುಪಾಧಿಃ ಕಲ್ಪಿತ ಮಯಾ||

ಏವಂ ವಿಮೃಶತೋ ಲಿತ್ಯಂ

ಲಿರ್ವಿಕಲ್ಪೇ ಸ್ಥಿತಿರ್ಮಮ||೧೭||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 2

Stanza 17

I am Pure Intelligence. Through ignorance (in-attention) only, I have imposed limitation (upon myself). Constantly reflecting in this way, I am abiding in the Absolute.

***



Friday, 11 November 2022

यथैवादर्शमध्यस्थे

अष्टावक्र गीता

अध्याय १

श्लोक १८

यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तःपरितस्तु सः।। 

तथैवास्मिन् शरीरेऽन्तःपरितः परमेश्वर।।१८।।

अर्थ :

जैसे दर्पण का अस्तित्व उसमें स्थित किसी प्रतिबिम्ब से भीतर और बाहर भी होता है, परमेश्वर भी इस शरीर में, इसी तरह से भीतर तथा बाहर भी  विद्यमान है।

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧

ಶ್ಲೋಕ ೧೮

ಯಥೈವಾದರ್ಶಮಧ್ಯಸ್ಥೇ ರೂಪೇऽನ್ತಃ ಪರಿತಸ್ತು ಸಃ||

ತಥೈವಾಸ್ಮಿನ್ ಶರೀರೇऽಲ್ತಃ ಪರಿತಃ ಪರಮೇಶ್ಶರಃ||೧೮||

--

Ashtavakra Gita

Chapter 1

Stanza 18

Just as a mirror exists within and without the image reflected in it also, even so the Supreme Lord exists inside and outside this body.

***