ENUNCIATION
and
RENUNCIATION
संकल्प और संन्यास
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जब तक संकल्प उठते रहते हैं तब तक संन्यास घटित नहीं होता, और संन्यास (घटित) हो जाने के बाद संकल्प उठना समाप्त हो जाता है। और यह कैसे होता है, अपने लिए इसका पता तो हर जिज्ञासु और मुमुक्षु को स्वयं ही लगाना होता है।
पहला तरीका कर्मयोग है, दूसरा साँख्ययोग है।
किसी भी प्रकार का ध्यान कर्मयोग है जबकि अवधान साँख्ययोग है।
ध्यान (Meditation) प्रयास का ही कोई प्रकार होता है जिसमें ध्यान के संकल्प, संकल्पकर्ता और संकल्प के विषय के बीच विभाजन होता है जहाँ चुनाव करने की बाध्यता होती है। बाध्यता ही अहंकार / अहं-संकल्प है।
अवधान (Awareness) अनायास और चुनावरहित सजगता है जहाँ उपरोक्त विभाजन अनुपस्थित होता है।
ध्यान मानसिक क्रियाशीलता होता है,
अवधान चुनावरहित सजगता।
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इस ब्लॉग में यह अंतिम पोस्ट है।
Good Bye!
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