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Tuesday, 24 February 2026

THE TEACHING.

ENUNCIATION

and

RENUNCIATION

संकल्प और संन्यास

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जब तक संकल्प उठते रहते हैं तब तक संन्यास घटित नहीं होता, और संन्यास (घटित) हो जाने के बाद संकल्प उठना समाप्त हो जाता है। और यह कैसे होता है, अपने लिए इसका पता तो हर जिज्ञासु और मुमुक्षु को स्वयं ही लगाना होता है।

पहला तरीका कर्मयोग है, दूसरा साँख्ययोग है।

किसी भी प्रकार का ध्यान कर्मयोग है जबकि अवधान साँख्ययोग है।

ध्यान (Meditation) प्रयास का ही कोई प्रकार होता है जिसमें ध्यान के  संकल्प, संकल्पकर्ता और संकल्प के विषय के बीच विभाजन होता है जहाँ चुनाव करने की बाध्यता होती है। बाध्यता ही अहंकार / अहं-संकल्प है।

अवधान (Awareness) अनायास और चुनावरहित सजगता है जहाँ उपरोक्त विभाजन अनुपस्थित होता है।

ध्यान मानसिक क्रियाशीलता होता है,

अवधान चुनावरहित सजगता।

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इस ब्लॉग में यह अंतिम पोस्ट है।

Good Bye! 

👋 

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Monday, 24 April 2023

त्यजैव ध्यानं सर्वत्र

अष्टावक्र गीता

अध्याय १५

श्लोक २०

त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद्धृदि धारय।।

आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि।।२०।।

(त्यज एव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चित् हृदि धारय। आत्मा त्वं मुक्तः एव असि किं विमृश्य करिष्यसि।।)

अर्थ : सर्वत्र ही और विषय-मात्र से ही ध्यान हटाओ, कुछ भी, और किसी भी विषय को हृदय में धारण ही न करो। तुम आत्मा और मुक्त ही हो विषयों का चिन्तन और विमर्श आदि करने से तुम्हें क्या प्राप्त होनेवाला है?

।।इति पञ्चदशाध्यायः।। 

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय २ : यह सन्दर्भ दृष्टव्य है :

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।।

सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।६२।।

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः।।

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।६३।।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೫

ಶ್ಲೋಕ ೨೦

ತ್ಯಜೈವ ಧ್ಯಾನಂ ಸರ್ವತ್ರ ಮಾ ಕಿಞ್ಚಿದ್ಧೃದಿ ಧಾರಯ ||

ಆತ್ಮಾ ತ್ವಂ ಮುಕ್ತ ಏವಾಸಿ ಕಿಂ ವಿಮೃಶ್ಯ ಕರಿಶ್ಯಸಿ||೨೦||

||ಇತಿ ಪಞ್ಚದಶಾಧ್ಯಾಯಃ||

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Ashtavakra Gita

Chapter 15

Stanza 20

Give up contemplating anything and hold nothing into your heart. You are verily the Self and therefore free. What will you do by thinking?

(Emptying of the mind?) 

Thus concludes chapter 15 of the text :

Ashtavakra Gita .