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Monday, 24 April 2023

त्यजैव ध्यानं सर्वत्र

अष्टावक्र गीता

अध्याय १५

श्लोक २०

त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद्धृदि धारय।।

आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि।।२०।।

(त्यज एव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चित् हृदि धारय। आत्मा त्वं मुक्तः एव असि किं विमृश्य करिष्यसि।।)

अर्थ : सर्वत्र ही और विषय-मात्र से ही ध्यान हटाओ, कुछ भी, और किसी भी विषय को हृदय में धारण ही न करो। तुम आत्मा और मुक्त ही हो विषयों का चिन्तन और विमर्श आदि करने से तुम्हें क्या प्राप्त होनेवाला है?

।।इति पञ्चदशाध्यायः।। 

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय २ : यह सन्दर्भ दृष्टव्य है :

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।।

सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।६२।।

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः।।

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।६३।।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೫

ಶ್ಲೋಕ ೨೦

ತ್ಯಜೈವ ಧ್ಯಾನಂ ಸರ್ವತ್ರ ಮಾ ಕಿಞ್ಚಿದ್ಧೃದಿ ಧಾರಯ ||

ಆತ್ಮಾ ತ್ವಂ ಮುಕ್ತ ಏವಾಸಿ ಕಿಂ ವಿಮೃಶ್ಯ ಕರಿಶ್ಯಸಿ||೨೦||

||ಇತಿ ಪಞ್ಚದಶಾಧ್ಯಾಯಃ||

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Ashtavakra Gita

Chapter 15

Stanza 20

Give up contemplating anything and hold nothing into your heart. You are verily the Self and therefore free. What will you do by thinking?

(Emptying of the mind?) 

Thus concludes chapter 15 of the text :

Ashtavakra Gita .

Thursday, 6 April 2023

चतुर्दशाध्याय

अष्टावक्र गीता

अध्याय १४

श्लोक १

जनक उवाच  --

प्रकृत्या शून्यचित्तोयः प्रमादाद्भाव भावनः।।

निद्रितो बोधित इव क्षीणसंसरिणो हि सः।।१।।

(प्रकृत्या शून्यचित्तः यः प्रमादात् भाव भावनः। निद्रितः बोधित इव क्षीणसंसरिणः हि सः।।)

अर्थ : वह जो स्वभाव से तो चित्त / चित्तवृत्ति से रहित है, प्रमाद (अनवधानता) के ही कारण कल्पनाएँ करता हुआ भावनाओं से युक्त प्रतीत होता है। जैसे कि सोए हुए मनुष्य से कुछ कहा जाने पर जैसे तैसे उसकी कोई प्रतिक्रिया होती है, इसी प्रकार उसका चित्त अत्यन्त दुर्बल होकर विषयों आदि में संचरित होता हुआ (मानो) भावों और भावकर्ता (विचार और विचारकर्ता) का रूप ग्रहण कर लेता है।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೪

ಶ್ಲೋಕ ೧

ಜನಕ ಉವಾಚ --

ಪ್ರಕೃತ್ಯಾ ಶೂನ್ಯಚಿತ್ತೋಯಃ ಪ್ರಮಾದಾತ್ಭಾವಭಾವನಃ||

ನಿದ್ರಿತೋ ಬೋಧಿತ ಇವ ಕ್ಷೀಣಸಂಸರಿಣೋ ಹಿ ಸಃ||೧||

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Ashtavakra Gita

Chapter 14

Stanza 1

Janaka said --

He has verily his worldly life exhausted, who has a mind emptied of (worldly) thoughts by nature spontaneously, who thinks of objects through inadvertence, and who is as it were awake though asleep.

(Effortless emptying of mind)

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