गीता 10/26
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षिणां च नारदः।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः।।२६।।
(गीता अध्याय १०)
सुबह 03:39 पर नींद खुली। निवृत्त होकर पुनः सो गया किन्तु सोने का अर्थ निद्रा में चले जाना नहीं, बस बिस्तर पर आराम से पड़े रहना है। निद्रा और जानने के बीच की वस्तु है "अवबोध" -
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।१५।।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।१६।।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।१७।।
में वर्णित "अवबोध" - attention.
मोबाइल में बैटरी 40% थी, इसलिए उसे चार्जर पर लगा दिया। कुछ मिनट कमरे में टहलता रहा। फिर याद आया, कल फरवरी माह का पहला दिन था। कैलेन्डर देखा तो इस पर ध्यान गया कि कल माघी पूर्णिमा थी।
आज फागुन की पहली तिथि है!
माघ अर्थात् मार्गशीर्ष / अग्रहायण मास।
मार्गशीर्ष अर्थात् संवत्सर के मार्ग / अयन का शीर्ष या अंतिम सिरा। अग्रहायण अर्थात् अग्र ह अयनम्।
फागुन अर्थात् फाल्गुन। जैसे माघ मास का संबंध मघा नक्षत्र से है, वैसे ही फाल्गुन का संबंध फल्गु से है। फल्गु वह नदी है जहाँ पितरों का श्राद्ध किया जाता है। गया में इसी नदी पर इसके क्षीणप्राय प्रवाह में पितरों का तर्पण न होने तक उन्हें पितृलोक में वास करना पड़ता है। यह पितृलोक कहाँ है? क्या यह स्मृति से परे कहीं और है! इसके अधिष्ठाता देवता का नाम है "अर्यमा", जो सूर्य के बारह रूपों द्वादशादित्याः में से अंतिम है। यह भी रोचक है कि संन्यास ग्रहण करने के अनुष्ठान के क्रम में स्वयं अपने आपका भी श्राद्ध / तर्पण अर्थात् पिण्डदान करना होता है। "फल्" धातु से "क" और "उ" प्रत्यय युक्त होने पर "फल्गु"/ "फाल्गुन" पद की सिद्धि होती है। इसी से बना अपभ्रंश है - फाल् तु - फालतू अर्थात् व्यर्थ। तीन युग्म नक्षत्रों में एक नाम फाल्गुन नक्षत्र का भी है -
पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, पूर्वा भाद्रपदा और उत्तरा भाद्रपदा।
फागुन से याद आया-
"फागुन के दिन चार, होली खेल मना रे!"
मीरा का गणित तीन तक ही था, चार उसकी गणना में बहुत, अनंत का द्योतक था। या यूँ भी हो सकता है कि उसने "चार" शब्द का प्रयोग "चार दिन की चाँदनी, फिर अँधेरी रात" के अर्थ में किया है। जब मनुष्य पर्याप्त जी चुका हो तो उसे इस तरह व्यर्थ जीते रहने से भी ऊब हो सकती है। और तब वह संन्यास आश्रम के लिए उपयुक्त हो जाता है, फिर भी उसे मृत्यु से डर लगता है। जिसे डर लगता है क्या उसकी मृत्यु नहीं होती? इस प्रश्न का उत्तर शायद ही किसी के पास है। फिर वह सोचता है - शायद फिर कोई नया शरीर होगा, उसमें एक संसार भी होगा। गीता में इसी संभावना की विश्वसनीयता की परीक्षा की गई है जब भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं -
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।५।।
अजोऽपि सन्नव्यात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।६।।
(अध्याय ४)
चित्ररथ अर्थात् संसाररूपी चित्ररूपी रथ और उस पर आरूढ समय नामक गन्धर्व।
समय के सन्दर्भ में नया वर्ष / संवत्सर जिसका आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से होता है और जिसका चरम फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर होता है। फाल्गुनी पूर्णिमा से अमावस्या तक चैत्र कृष्ण पक्ष होता है, जब वर्तमान वर्ष / संवत्सर व्यतीत हो जाता है और प्रकृति जीवन के पुनः नये रूप में अभिव्यक्त होती है।
यह पोस्ट यहीं तक।
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