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Sunday, 22 January 2023

अहं वा सर्वभूतेषु

अष्टावक्र गीता

अध्याय ६

श्लोक ४

अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि।।

इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः।।४।।

(अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतानि अथो / अथ-उ मयि। इति ज्ञानं तथा एतस्य न त्यागः न ग्रहः लयः।।)

अर्थ : आत्मा सभी भूतों में अवस्थित और सभी भूत भी मुझ आत्मा में ही अवस्थित हैं। यह भान अपना / आत्मा का ज्ञान है, जो सदा से प्राप्त ही है और जिसे प्राप्त नहीं किया जाना होता, जिसे न तो त्यागा जा सकता है और जो कभी विलुप्त भी नहीं हो सकता।

।।इति षष्ठाध्यायः।।

§ श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १८ --

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।।

अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्।।२०।।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೬

ಶ್ಲೋಕ ೪

ಅಹಂ ವಾ ಸರ್ವಭೂತೇಷು

ಸರ್ವಭೂತಾನ್ಯಥೋ ಮಯಿ||

ಇತಿ ಜ್ಟಾನಂ ತಥೈತಸ್ಯ

ನ ತ್ಯಾಗೋ ನ ಗ್ರಹೋ ಲಯಃ||೪||

||ಇತಿ ಷಷ್ಠಾಧ್ಯಾಯಃ||

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Ashtavakra Gita

Chapter 6

Stanza 4

I am (The Self is) indeed in all beings and all beings are in Me (The Self). This awareness is Knowledge. So it has neither to be given up, nor to be regained, nor is forgotten / lost.

Thus concludes the chapter 6 of this text :

Ashtavakra Gita. 

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Wednesday, 11 January 2023

आत्मानमद्वयं कश्चित्

अष्टावक्र गीता

अध्याय ४

श्लोक ६

आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम्।।

यद्वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्।।६।।

(आत्मानं अद्वयं कश्चित् जानाति जगदीश्वरम्। यत् वेत्ति तत् सः कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्।।) 

अर्थ : अपनी द्वैतरहित निज और नित्य आत्मा को ही जगत् का एकमात्र ईश्वर जाननेवाला कोई ही जगत् के स्वामी को जानता है । जो इस प्रकार तत्त्वतः जानता है, वह इसी विवेक* से प्रेरित होकर समस्त आचरण करता है, उसे भी कहीं भी, किसी से भी  कभी कोई भय नहीं होता।

।। इति चतुर्थोऽध्यायः।।

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*अद्वैत-निष्ठा :

ईश्वरो गुरु आत्मेति मूर्तिभेदाविभागिने। 

व्योमवद्व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः।। 

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೪

ಶ್ಲೋಕ ೬

ಆತ್ಮಾನಮದ್ವಯಂ ಕಶ್ಚಿ-

ಜ್ಜಾನಾತಿ ಜಗದೀಶ್ವರಂ||

ಯದ್ವೇತ್ತಿ ತತ್ ಸ ಕುರುತೇ

ನ ಭಯಂ ತಸ್ಯ ಕುತ್ರಚಿತ್||೬||

||ಇತಿ ಚತುರ್ಥೊऽಧ್ಯಾಯಃ||

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Ashtavakra Gita

Chapter 4

Stanza 6

Rare is the man who knows himself as one without a second as well as the Lord of the universe. He does what he knows and has no fear from any quarter.

Thus concludes chapter 4 of :

The Ashtavakra Gita.

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