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Thursday, 1 December 2022

सशरीरमिदं विश्वं

अष्टावक्र गीता

अध्याय २

श्लोक १९

सशरीरमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चितम्।।

शुद्ध चिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन्कल्पनाऽधुना।।१९।।

अर्थ :

इस पूरे शरीर सहित यह विश्व, शुद्ध चिन्मात्र आत्मा ही है, इससे अन्य कुछ नहीं, केवल कल्पना ही है यह निश्चित हुआ, तो अब यह कल्पना किसे आती है ! चूँकि आत्मा से अन्य कुछ नहीं है, इसलिए इस कल्पित उपाधि को व्यर्थ जानकर त्याग दिया जाना ही उचित है।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೨

ಶ್ಲೋಕ ೧೯

ಸಶರೀರಮಿದಂವಿಶ್ವಂ ನ ಕಿಞ್ಚಿದಿತಿ ನಿಶ್ಚಿತಂ||

ಶುದ್ಧಚಿನ್ಮಾಚ್ರ ಆತ್ಮಾ ಚ ತತ್ಕಸ್ಮಿನ್ಕಲ್ಪನಾऽಧುನಾ||೧೯||

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Ashtavakra Gita

Chapter 2

Stanza 19

I have known for certain that the body and the universe are nothing and that the Atman is only pure Intelligence. So, on which now can super-imposition be possible!

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Tuesday, 29 November 2022

बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः

अष्टावक्र गीता

अध्याय २

श्लोक १७

बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया।।

एवं विमृशतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम।।१७।।

(बोधमात्रः अहं अज्ञानात् उपाधिः कल्पितः मया। एवं विमृशतः नित्यं निर्विकल्पे स्थितिः मम।)

अर्थ : 

यद्यपि अहं (मैं)- आत्मा बोधमात्र है, अज्ञानवश मेरे द्वारा उपाधि कल्पित कर ली जाती है (और प्रमादवश अपने आपको उपाधि मान लिया जाता है)। और जब इस पर ध्यानपूर्वक विमर्श किया जाता है तो पाया जाता है कि मेरा वास्तविक स्वरूप तो नित्य और निर्विकल्प है। 

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೨

ಶ್ಲೋಕ ೧೭

ಬೋಧಮಾತ್ರೋऽಹಮಜ್ಞಾಲಾ-

ದುಪಾಧಿಃ ಕಲ್ಪಿತ ಮಯಾ||

ಏವಂ ವಿಮೃಶತೋ ಲಿತ್ಯಂ

ಲಿರ್ವಿಕಲ್ಪೇ ಸ್ಥಿತಿರ್ಮಮ||೧೭||

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Ashtavakra Gita

Chapter 2

Stanza 17

I am Pure Intelligence. Through ignorance (in-attention) only, I have imposed limitation (upon myself). Constantly reflecting in this way, I am abiding in the Absolute.

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