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Thursday, 23 February 2023

कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं

अष्टावक्र गीता

अध्याय ९

श्लोक ६

कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः।।

निर्वेदसमता युक्त्या यस्तारयति संसृतेः।।६।।

(कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः। निर्वेदसमता युक्त्या यः तारयति संसृतेः।।)

अर्थ  : निर्वेद और समत्व की युक्ति से जिसने चैतन्य को व्यक्त और अव्यक्त इन दोनों प्रकारों में जान लिया है, और जो संसार से सबका उद्धार कर सबको तार देता है, क्या वह गुरु ही नहीं है!

(इसे तीन भिन्न अर्थों में ग्रहण किया जा सकता है। एक अर्थ तो यह है कि ऐसा कोई भी मनुष्य वस्तुतः गुरुतुल्य है, दूसरा यह कि गुरु ही संसार में सबका उद्धार करने और सबको तारने के लिए ऐसे मनुष्य के रूप में अवतरित होता है। इसका तीसरा यह अर्थ यह भी ग्रहण किया जा सकता है कि चैतन्य ही एकमात्र गुरु है जो भिन्न भिन्न और अनेक मूर्तियों में प्रकट है। 

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೯

ಶ್ಲೋಕ ೬

ಕೃತ್ವಾ ಮೂರ್ತಿಪರಿಜ್ಞಾನಂ

ಚೈತನ್ಯಸ್ಯ ನ ಕಿಂ ಗುರುಃ||

ನಿರ್ವೇದಸಮತಾ ಯುಕ್ತ್ಯಾ

ಯಸ್ತಾರಯತಿ ಸಂಸೃತೇಃ||೬||

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Ashtavakra Gita

Chapter 9

Stanza 6

He, who by means of complete indifference to the world, equanimity and the reasoning, gains a knowledge of the true nature of the Transcendental Intelligence / Consciousness, and saves others from the world,  - Is he not really the spiritual guide?

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Sunday, 19 February 2023

कोऽसौ कालो वयः

अष्टावक्र गीता

अध्याय ९

श्लोक ४

कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम्।।

तान्युपेक्ष्य यथा प्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात्।।४।।

(कः असौ कालः वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि न उ नृणाम्। तानि उपेक्ष्य यथा प्राप्तवर्ती सिद्धिं अवाप्नुयात्।।) 

अर्थ : ऐसा कौन सा समय होता है या आयु होती है जब मनुष्यों को कोई न कोई द्वन्द्व नहीं होता! अर्थात् ऐसा कभी नहीं होता कि मनुष्य द्वन्द्वों से रहित हो सके। इस स्थिति में यही उचित है कि उन सभी द्वन्द्वों की उपेक्षा करते हुए जो भी प्राप्त या अप्राप्त होता है, वह उससे संतुष्ट और अप्रभावित रहे।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೯

ಶ್ಲೋಕ ೪

ಕೋऽಸೈ ಕಾಲೋ ವಯಃ ಕಿಂ ವಾ

ಯತ್ರ ದ್ಪನ್ದ್ವಾನಿ  ನಿನಿ ನೋ ನೃಣಾಂ||

ತಾನ್ಯುಪೇಕ್ಷ್ಯ ಯಥಾಪ್ರಾಪ್ತ-

ವರ್ತೀ ಸಿದ್ಧಿಮವಾಪ್ನುಯಾತ್||೪||

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Ashtavakra Gita

Chapter 9

Stanza 4

What is that time or age (in the life) in which the pairs of opposites don't exist for men! (-- There is never such a time in life). One who is content with whatever comes of itself, and quits these (pairs of these opposites) attains peace / perfection ultimate.

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