Tuesday, 24 February 2026

THE TEACHING.

ENUNCIATION

and

RENUNCIATION

संकल्प और संन्यास

--

जब तक संकल्प उठते रहते हैं तब तक संन्यास घटित नहीं होता, और संन्यास (घटित) हो जाने के बाद संकल्प उठना समाप्त हो जाता है। और यह कैसे होता है, अपने लिए इसका पता तो हर जिज्ञासु और मुमुक्षु को स्वयं ही लगाना होता है।

पहला तरीका कर्मयोग है, दूसरा साँख्ययोग है।

किसी भी प्रकार का ध्यान कर्मयोग है जबकि अवधान साँख्ययोग है।

ध्यान (Meditation) प्रयास का ही कोई प्रकार होता है जिसमें ध्यान के  संकल्प, संकल्पकर्ता और संकल्प के विषय के बीच विभाजन होता है जहाँ चुनाव करने की बाध्यता होती है। बाध्यता ही अहंकार / अहं-संकल्प है।

अवधान (Awareness) अनायास और चुनावरहित सजगता है जहाँ उपरोक्त विभाजन अनुपस्थित होता है।

ध्यान मानसिक क्रियाशीलता होता है,

अवधान चुनावरहित सजगता।

--

इस ब्लॉग में यह अंतिम पोस्ट है।

Good Bye! 

👋 

***



Sunday, 1 February 2026

ChitrarathaM.

गीता 10/26

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षिणां च नारदः। 

गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः।।२६।।

(गीता अध्याय १०)

सुबह 03:39 पर नींद खुली। निवृत्त होकर पुनः सो गया किन्तु सोने का अर्थ निद्रा में चले जाना नहीं, बस बिस्तर पर आराम से पड़े रहना है। निद्रा और जानने के बीच की वस्तु है "अवबोध" -

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।

शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।१५।।

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।

न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।१६।।

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।१७।।

में वर्णित "अवबोध" - attention.

मोबाइल में बैटरी 40% थी, इसलिए उसे चार्जर पर लगा दिया। कुछ मिनट कमरे में टहलता रहा। फिर याद आया, कल फरवरी माह का पहला दिन था। कैलेन्डर देखा तो इस पर ध्यान गया कि कल माघी पूर्णिमा थी।

आज फागुन की पहली तिथि है!

माघ अर्थात् मार्गशीर्ष / अग्रहायण मास। 

मार्गशीर्ष अर्थात् संवत्सर के मार्ग / अयन का शीर्ष या अंतिम सिरा। अग्रहायण अर्थात् अग्र ह अयनम्। 

फागुन अर्थात् फाल्गुन। जैसे माघ मास का संबंध मघा नक्षत्र से है, वैसे ही फाल्गुन का संबंध फल्गु से है। फल्गु वह नदी है जहाँ पितरों का श्राद्ध किया जाता है। गया में इसी नदी पर इसके क्षीणप्राय प्रवाह में पितरों का तर्पण न होने तक उन्हें पितृलोक में वास करना पड़ता है। यह पितृलोक कहाँ है? क्या यह स्मृति से परे कहीं और है! इसके अधिष्ठाता देवता का नाम है "अर्यमा", जो सूर्य के बारह रूपों द्वादशादित्याः में से अंतिम है। यह भी रोचक है कि संन्यास ग्रहण करने के अनुष्ठान के क्रम में स्वयं अपने आपका भी श्राद्ध / तर्पण अर्थात् पिण्डदान करना होता है। "फल्" धातु से "क" और "उ" प्रत्यय युक्त होने पर "फल्गु"/ "फाल्गुन" पद की सिद्धि होती है। इसी से बना अपभ्रंश है - फाल् तु - फालतू अर्थात् व्यर्थ। तीन युग्म नक्षत्रों में एक नाम फाल्गुन नक्षत्र का भी है -

पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, पूर्वा भाद्रपदा और उत्तरा भाद्रपदा।

फागुन से याद आया-

"फागुन के दिन चार, होली खेल मना रे!"

मीरा का गणित तीन तक ही था,  चार उसकी गणना में बहुत, अनंत का द्योतक था। या यूँ भी हो सकता है कि उसने "चार" शब्द का प्रयोग "चार दिन की चाँदनी, फिर अँधेरी रात" के अर्थ में किया है। जब मनुष्य पर्याप्त जी चुका हो तो उसे इस तरह व्यर्थ जीते रहने से भी ऊब हो सकती है। और तब वह संन्यास आश्रम के लिए उपयुक्त हो जाता है, फिर भी उसे मृत्यु से डर लगता है। जिसे डर लगता है क्या उसकी मृत्यु नहीं होती? इस प्रश्न का उत्तर शायद ही किसी के पास है। फिर वह सोचता है - शायद फिर कोई नया शरीर होगा, उसमें एक संसार भी होगा। गीता में इसी संभावना की विश्वसनीयता की परीक्षा की गई है जब भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं -

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।५।।

अजोऽपि सन्नव्यात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।६।।

(अध्याय ४)

चित्ररथ अर्थात् संसाररूपी चित्ररूपी रथ और उस पर आरूढ समय नामक गन्धर्व।

समय के सन्दर्भ में नया वर्ष / संवत्सर जिसका आरंभ  चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से होता है और जिसका चरम फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर होता है। फाल्गुनी पूर्णिमा से अमावस्या तक चैत्र कृष्ण पक्ष होता है, जब वर्तमान वर्ष / संवत्सर व्यतीत हो जाता है और प्रकृति जीवन के पुनः नये रूप में अभिव्यक्त होती है।  

यह पोस्ट यहीं तक। 

***


   





Friday, 26 December 2025

KALKI

Hindi Poetry

हिन्दी कविता

--

कर रहे हैं कल्कि कलरव

भीत दैत्य, भीत दानव,

भीत राक्षस, भीत मानव!

ओतप्रोत भय से जन जन,

भीत देव, भीत असुर,

भीत यक्ष, पिशाच भी,

मोह-पीड़ित, विश्व सारा,

आतंकित, आशंकित!

कर रहे भविष्यवाणी,

ज्योतिषी, भविष्यवेत्ता,

रहस्यदर्शी भी हैं अभी,

किन्तु किसे है सच पता,

अनुमान करते हैं सभी!

आगमन की है प्रतीक्षा,

आगमन होना है जिनका,

वे राम हैं या कृष्ण हैं,

रुद्र हैं या कल्कि हैं,

किन्तु कंपन वायु में है,

कंपित दिग्-दिगन्त है,

भीत जगत् जड चेतन,

भीत सन्त-महन्त हैं!

और किसी अप्रत्याशित,

नितान्त ही अनपेक्षित,

क्षण पर अतिथि आएँगे,

करते हुए आश्चर्यचकित!!

अधर्म से न होना मोहित,

अज्ञान से न होना भ्रमित,

कर्तव्य में संलग्न रहना,

अविचलित, प्रमादरहित!

***








 


 

Sunday, 14 December 2025

OPEN AND CLOSE CONTOURS.

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४

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चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।

तस्य कर्तारमपि मां विद्धि-अकर्तारमव्ययम्।।१३।।

कॉलेज में पोस्ट-ग्रेेजुुएशन M.Sc. Mathematics में गणित विषय का अध्ययन करते समय एक प्रोफेसर का मुझ पर विशेष ध्यान रहता था। और दूसरे प्रोफेसर मुझे झक्की, पागल या बेबकूफ समझते थे। फिर भी वे सभी मुझे talented तो मानते ही थे। इसका कारण यह भी था कि उनकी तुलना में मेरा संस्कृत भाषा का ज्ञान बहुत अधिक था और यद्यपि 1976-77 में उस समय वे सभी उच्च गणित में न सिर्फ Ph.D. D.Lit और, D.Sc. थे। किन्तु संस्कृत विषय का उनका ज्ञान नगण्यप्राय ही कहा जा सकता था और वे विनम्रतापूर्वक यह मानते भी थे। शायद यही कारण था कि कभी तो वे मुझे आदर देते थे, और कभी मेरा उपहास भी करते थे।

वे प्रोफेसर जिनकी मुझ पर विशेष कृपादृष्टि थी, हमें Complex Analysis पढ़ाया करते थे, जिसमें एक ऐसे Complex Plane के संदर्भ में उसके एक अक्ष पर real numbers और दूसरे पर imaginary numbers स्थापित किए जाते थे । संक्षेप में :

(X, iY) या (Y, iX).

और Co-ordinate Geometry के किसी गणितीय फलन (Mathematical function) के चरित्र का मूल्यांकन उस तरह से उस आधार पर किया जाता था।

उदाहरण के लिए परस्पर आश्रित दो राशियों के संबंध को व्यक्त करनेवाला कोई algebraic equation, जो Real Plane पर किसी बन्द (Closed) आकृति के रूप में व्यक्त होता था, वही Complex Plane पर खुले (Open) के रूप में हो सकता था। इसलिए इसे Closed and Open Contour कहा जाता है (ऐसा मैं कह सकता हूँ।)

इसी परिकल्पना (hypothesis) पर यदि 

TIME ASSUMED AS DURATION AND AS A MONENTARY EVENT

के मध्य किसी घटनाक्रम को चित्रित किया जाए, अर्थात् किसी CO-ORDINATE FUNCTION को PLOT किया जाए तो भौतिकीय राशि के जिस रूप में TIME का मूल्यांकन हो सकता है उसे ही क्रमशः 

अतीत,  वर्तमान और भविष्य 

की संज्ञा दी जाती है। पतञ्जलि मुनि के द्वारा इस संपूर्ण वैचारिक गतिविधि को विकल्प नामक वृत्ति कहा गया - शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः।।९।। (समाधिपाद) "फिर,

PHYSICS, CHEMISTRY MATHEMATICS 

को कैसे परिभाषित करोगे?" 

उन्होंने मुझसे पूछा। "

PHYSICS IS कर्म / ACTIVITY,

CHEMISTRY IS गुुण / QUALITY / 

MATHEMATICS IS मात्रा / QUANTITY,

AGAIN MATHEMATICS IS 

CONTEMPLATION.

Earlier when I had  recited the verse referred to as above in the beginning here, I had uttered it in other way like : 

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागयोः।।

So I had to correct myself, (though I was not wrong from the grammatical point of view), because in my view both the words convey the same sanse.

फिर अनेक वर्षों के बाद पुनः उनसे मिलना हुआ तो बोले -

"हम लोग तो D.Sc. थे, पर तुमने तो गीता पर

Post Doctoral Research 

कर ली!"

मैंने विनम्रता से उनके चरण छूकर कहा -

"यह सब आपका आशीर्वाद है गुरुवर!"

उपरोक्त श्लोक को स्मरण करते हुए प्रायः सोचता था कि क्या T GUANIN A और S नामक DNA के चार मूल जैव द्रव्य ही वे तत्व नहीं हैं जिन्हें यहाँ "चातुर्वर्ण्यं" कहा गया है!

इस पर फिर कभी!







 



Wednesday, 3 December 2025

GITA 5/1, 5/2

सांख्यनिष्ठा और कर्मनिष्ठा 

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संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।

यच्छ्रेयः एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।।१।।

संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेसकरावुभौ। 

तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।२।।

Here Is The Lock Invisible.

संंन्यास अर्थात समस्त कर्मों का सम्यक न्यास कर देना उन्हें संपूर्णतः न तो सैद्धांतिक दृष्टि से और व्यावहारिक दृष्टि से भी संभव है क्योंकि कर्ममात्र प्रकृति के गुणों के माध्यम से घटित होते हैं-

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।।२७।।

(अध्याय ३)

प्रकृति का अर्थ है - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारयुक्त अंत:करण और भौतिक प्राण, इंद्रियों और चेतनायुक्त शारीरिक जीवन। इसलिए अपने स्वतंत्र कर्ता होने की मान्यता ही वह दोषपूर्ण त्रुटि है जिसे अविद्या कहा जाता है। अविद्या अस्मिता राग-द्वेष और अभिनिवेश इन पांच क्लेशों में से सर्वाधिक शक्तिशाली और प्रथम क्लेश है जो प्रकृति के गुणों के माध्यम से कार्यरूप ग्रहण करता है और घटित होता हुआ प्रतीत भी होता है। इस प्रकार का घटनाक्रम केवल प्रतीति ही होता है, वास्तविक नहीं होता। चेेतना में हो रही इसी प्रतीति को प्रत्यय, संवेदन या वृत्ति (mode of the mind) कहा जाता है। इसी वृृत्ति को मन, बुद्धि, चित्त अहंकार और इनके संयुक्त या पृथक् पृथक् दिखाई देनेवाले इंद्रिय बुद्धि और मनोगम्य विषयों से संबंधित गतिविधि के रूप में भी जाना जाता है। इससे ही मन में -

यह मैंने किया, मैंने नहीं किया, मैं कर रहा हूं, मैं नहीं कर रहा हूं, जैसी विभिन्न मान्यताएं अस्तित्व ग्रहण करती हुई प्रतीत होती हैं और जिनमें समान रूप से विद्यमान "मैं" नामक तत्व की सत्यता पर संदेह तक नहीं होता, क्योंकि ऐसा कोई संदेह करनेवाला कहीं होता ही नहीं। इसे ही प्रमाद (in-attention) कहा जाता है, जो प्रकृति के रजोगुण का प्रभाव होता है। चूंकि समस्त इंद्रियां स्वभाव से ही बहिर्मुख अर्थात् विषयाभिमुख होती हैं इसीलिए उनसे संलग्न मन भिन्न-भिन्न विषयों की ओर आकर्षित होकर चंचल रहता है, जो प्रकृति के रजोगुण का विक्षेप (distraction) नामक प्रभाव होता है।

केवल और शुद्ध भानमात्र ही वह प्रकाश (light) होता है जिसे सतोगुण कहा जाता है।

इस प्रकार - कर्म और कर्ता केवल मान्यता ही हो सकते हैं न कि वास्तविकता। इसी प्रकार की एक मान्यता अहं (आत्मा) के देह-मन-बुद्धि-चित्त में अस्मिता के रूप में व्यक्त होती है जो पुनः क्लेश ही है।

गीता अध्याय १८ में वर्णित निम्न श्लोक के अनुसार-

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।

सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुः त्यागं विचक्षणः।।२।।

दोनों ही स्थितियों में अस्मिता कर्तृत्वभाव के रूप में विद्यमान होती ही है जबकि अध्याय ५ के निम्नलिखित श्लोकोॅ में जो स्पष्ट किया गया है तदनुसार-

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।

नादत्ते कस्यचित् पापं सुकृतं चैव न विभुः।

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।१५।।

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितं आत्मनः।

तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत् परम्।।१६।।

संक्षेप में -

आत्मानुसंधान / सांंख्य योग / ज्ञानयोग और कर्मयोग 

तपःस्वाध्यायेेश्वरप्रणिधानः क्रिययोगः।।

दो ही निष्ठाएं पात्रता के अनुसार आध्यात्मिक दृष्टि से समान रूप से श्रेयस्कर हैं।

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Monday, 1 December 2025

THE PSYCHE.

भाव और भाव-व्याधि

भव से भाव का जन्म होता है,

और भाव से भावना का जन्म होता है।

भावना से ध्वनि का जन्म होता है, 

ध्वनि से भाषा और शब्द (word) का जन्म होता है।

भाषा से अर्थ  (sense) का जन्म होता है।

अर्थ से विचार (Thought) का जन्म होता है।

विचार से अर्थ और अर्थ से विचार के साहचर्य से कल्पना का जन्म होता है।

विपर्यय और विकल्प किसका?

प्रमाण-वृत्ति का।

विपर्यय से भ्रम का जन्म होता है,

जबकि विकल्प से विक्षेप का।

प्रमाणविकल्पविपर्ययनिद्रास्मृतयः।।६।।

इन्हें ही चित्त की वृत्ति कहा जाता है।

प्रत्यक्षप्रमाणागमाः प्रमाणानि।।७।।

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्।।८।।

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः।।९।।

अभाव-प्रत्यययालम्बना वृत्तिः निद्रा।।१०।।

अनुभूतविषयासम्प्रमोषः वृत्तिः स्मृतिः।।११।।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।।२।।

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।।३।।

वृत्तिसारूप्यमितरत्र।।४।।

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः।।५।।

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।।६।।

...

ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।

देशबन्धचित्तस्य धारणा।।१।।

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।।२।।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः।।३।।

त्रयमेकत्रः संयमः।।४।।

तज्जयात्प्रज्ञालोकः।।

प्रज्ञानं ब्रह्म।।

किमिति तद् ब्रह्य?

जडं, चेतनः, जीव-ईशौ, सर्वमिति।।

जडं वेदनीयं परेण। 

चेतनः - वेदनीयः स्वेन स्वया आत्मना आत्मना च आत्मन्यपि।। 

ईशः - ईश्वरः

सर्वम् खलु इदं ब्रह्म।।

सर्वभूतेषु येनैकं

भावमव्ययमीक्षते।

अविभक्तं विभक्तेषु

तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम्।।२०।।

(गीता, अध्याय १८)

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। 

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।६९।।

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः

प्रविशन्ति यद्वत्।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे

स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।७०।।

विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः। 

निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति।।७१।।

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति। 

स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।७२।।

यह है सांख्यज्ञान

--निरंतरम्--

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Sunday, 30 November 2025

THE CHAIN.

भव-व्याधि

--

जीवन शरीर को जन्म देता है,

शरीर चेतना को। 

चेतना अनुभव को जन्म देती है,

अनुभव अज्ञान को। 

अज्ञान अनुभवकर्ता को जन्म देता है, 

अनुभवकर्ता स्मृति को। 

स्मृति सातत्य को जन्म देती है, 

सातत्य समय को।

समय अतीत को जन्म देता है, 

अतीत भविष्य को। 

भविष्य लोभ को जन्म देता है, 

लोभ भय को। 

भय हिंसा को जन्म देता है,

हिंसा क्रोध को,

क्रोध ग्लानि को जन्म देता है, 

ग्लानि अवसाद को।

अवसाद विक्षेप को जन्म देता है, 

विक्षेप उन्माद को। 

उन्माद अंत है,

जो मृत्यु तक ले जाता है।

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Monday, 24 November 2025

MODES OF MIND.

02:43 a. m. 

महात्मा और महापुरुष 

इस पोस्ट को लिखने से अपने आपको बहुत रोका, फिर सोचा कि लिखकर कुछ समय बाद डिलीट कर दूँगा।

प्रायः रात्रि में तीन बजे नींद खुल जाती है। पता नहीं कि क्या इसका कोई विशेष कारण होता है या यह बस एक संयोग ही है। बरसों से ऐसा है इस पर कभी ध्यान नहीं दिया। और इस पर भी कभी ध्यान नहीं दिया कि नींद से जागते ही लघुशंका के लिए जाना होता है। क्या मेरे साथ ही ऐसा है? या कि दूसरे सभी के साथ भी ऐसा होता है, इस पर भी कभी ध्यान नहीं गया।

वर्ष 1991 में जब नर्मदा किनारे रहता था और जब भी नहाने के लिए नदी में उतरता था तो भी यही होता था। अचानक लघुशंका का वेग जाग्रत हो उठता था। नदी या जलाशय में ऐसा करना शास्त्र के अनुसार भी निषिद्ध है यह भी बहुत पहले से पता था इसलिए मैंने नदी में स्नान करने ही बंद कर दिया। फिर सोचा पहले नदी से बाहर कुछ लोटा जल शरीर पर उँडेल कर नदी से कुछ दूर इस वेग से मुक्त होकर फिर नदी में प्रवेश किया जाए। किन्तु  यह भी कभी कभी इसलिए संभव न हो पाता था क्योंकि आसपास बहुत से दूसरे लोग हो सकते थे। तब से अब तक कभी नदी में स्नान ही नहीं किया। एक बार नदी से इस बारे में मन ही मन प्रश्न किया तो वह बोली - सभी प्राणी मेरे लिए वैसे ही हैं जैसे किसी माता का नवजात शिशु उसके लिए होता है। पर मैं इस तर्क को स्वीकार न कर पाया। अभी कुछ समय पहले एक स्थान पर किन्हीं  महात्मा जी के द्वारा इन स्थितियों का उल्लेख किए जाने पर मेरा ध्यान इस ओर गया। ऐसे ही एक और महापुरुष का स्मरण हुआ जो बचपन में कुएँ में उतरकर नहाते थे, जिसका उल्लेख उन्होंने स्वयं ही किया था।

हो सकता है कि शरीर-मनोविज्ञान की दृष्टि से यह घटना  किसी विशेष महत्वपूर्ण तथ्य की सूचक होती है। शायद इसलिए भी क्योंकि इस प्रकार से शीतल या उष्ण पानी से स्नान करते समय मन में न चाहते हुए भी अनायास ही एकत्र हुए अनेक दबावों और कुंठाओं से भी क्षण भर में ही मुक्ति हो जाने होने से मन एकाएक ही बहुत हल्का और प्रफुल्ल भी हो जाता है। और महात्मा जी ने इसका भी उल्लेख किया था।

किन्तु यह भी लगा कि सनातन धर्म में विभिन्न मुहूर्तों पर तीर्थों में स्नान को इतना महत्वपूर्ण क्यों कहा गया होगा। जिन देशों में नदियाँ और तालाब आदि नहीं हैं वहाँ पर भी समुद्रों के तट पर लोग प्रसन्न होकर जलक्रीड़ा करना चाहते हैं!

स्पष्ट है कि इस प्रकार से मन अनायास ही उस अवस्था में चला जाता है जिसे प्राप्त करने के लिए बड़े बड़े योगी, तपस्वी जप तप, उपासना और व्रतों आदि अनेक कठिन तरीकों का प्रयोग करते हैं।

क्षण भर के लिए मन निर्भर हो जाता है और निर्विचार अवस्था में स्वभावस्थ हो जाता है। स्वभाव कोई वृत्ति न होकर वह अवस्था है जब अपने आपके दृष्टा-मात्र होने की वास्तविकता स्वयं पर अनायास प्रकट / उद्घाटित हो उठती है। 

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।।

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।।

वृत्तिसारूप्यमितरत्र।।

फिर अचानक यह बोध भी उत्पन्न हुआ कि प्राणिमात्र में काम के प्रति इतना प्रबल और स्वाभाविक आकर्षण क्यों होता है?

काम-कृत्य की चरम पूर्णता में मुक्ति प्राप्त होने का जो परम आनन्द मन को क्षण भर के लिए अनुभव होता है, क्या उसकी ही स्थायी प्राप्ति के लिए मन हमेशा ही लालायित नहीं रहता?

क्या तुरंत ही कोई वृत्ति आकर उस अनुभव को आवरित नहीं कर लेती है?

संभोग से समाधि की ओर

के दर्शन को प्रस्तुत करनेवाले महापुरुष शायद इसी ओर हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहते थे।

सिद्धान्ततः इससे इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु इस दर्शन की गहराई को समझनेवाले इने गिने लोग ही हो सकते हैं। और शायद इसीलिए किसी में इतना साहस नहीं हो सका कि सरलता से उन महापुरुष के दर्शन को खुले आम स्वीकार कर सकें। और यदि किसी में ऐसा साहस था भी तो वे कुछ भोगवादी पाश्चात्य विचार के समर्थक जिन्हें सतत और अंतहीन भोग में ही जीवन की चरम सार्थकता प्रतीत होती थी।   

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Friday, 21 November 2025

FOMO, FOFO, ...

AND THE FEAR OF BEING LOST.

Mind or the Individual consciousness is a funny thing. 

There is this Fear of Missed Out,

Then,

There is this Fear of Finding Out -

Something which one doesn't want to see and come face to face with. 

For example when a suspicion raises its head.

Like if you've contracted Covid-19.

Then still there is yet another one :

The Fear of being found out by those who you don't want to see or talk to.

They have named These conditions : FOMO and FOFO.

Maybe the last one could be given the name :

Fear of Being coming Face to Face with the Reality, which one always tries to run away from.

And what about when you come across :

The Fear Of Being Lost?-

FOLO? 

I wonder if there is anyone on the earth who never had this fear.

In the first place, isn't this fear quite an irrational and illogical too?

How could one possibly be Lost?

Possibly Maybe for others but could one be Lost to oneself? 

One can say :

I was Lost in thoughts,

My mind was distracted.

This is really the beginning of the ignorance about the Reality of oneself. 

Still almost everyone becones a victim to this because of sheer In-attention only. 

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ७ श्लोक २७;

Shrimadbhagvadgita,

chapter 7, verse 27;

Points out ;

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। 

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।

The feeling : I'm Lost.

Is itself a self-contradictory idea.

No one can say this to one-self,

No-one, other than your-self could be an evidence to this and could point out this to you.

***  


 








Wednesday, 12 November 2025

The Funeral.

दोहराव 

कविता

--

सबके ही हैं हाथ बन्धे,

अपने स्वार्थ में सब अन्धे,

सबकी अपनी शवयात्रा है,

खुद को ही सब देते कन्धे।

बाँया कभी, कभी दाहिना,

दोनों ही कन्धे दुखते हैं,

अदल बदल कर चलते हैं,

इसी बीच कुछ रुकते हैं, 

जब आ जाती है मंजिल,

कुछ इंतजार भी करते हैं,

फिर सब जल्दी से हो जाए, 

उम्मीद यही सब करते हैं।

घर पर लौट, स्नान विश्राम,

फिर उठकर बाकी के काम, 

फिर अगले दिन की तैयारी,

फिर अगले दिन भी यही काम!

यूँ ही तो हर दिन होता है,

इंसान सुबह को उठता है,

थककर रात, सो जाता है,

इंसान ही क्या, उसकी दुनिया,

दुनिया से यही तो नाता है!!

***








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Monday, 10 November 2025

Primordial and Primitive

धर्म, समाज और सभ्यता

आद्य, प्राचीन और सनातन

वर्तमान समय के वैज्ञानिकों का अनुसंधान इन प्रश्नों के दायरे में शुरु होकर इसी दायरे में समाप्त हो जाता है कि कोई स्थिति कब और कैसे प्रारंभ हुई होगी। और वे इस ओर से अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं कि क्या कभी इस प्रश्न का आरंभ हुआ होगा? तात्पर्य यह कि उन्होंने पहले ही से यह मान रखा होता है कि सब कुछ कभी न कभी शुरू हुआ होगा, वे जानबूझकर यह भूल जाते हैं या फिर अनवधानता / लापरवाही के कारण इस तथ्य की उपेक्षा कर देते हैं कि जिसे वे "समय" कहते हैं उसके प्रारंभ या अंत होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। घटनाओं के क्रम और उनके बीच कल्पित सातत्य से आधार पर वह स्वयं के "समय" को परिभाषित करता है और इस "समय" के आधार पर घटनाओं की अवधि और उनके क्रम और उस "समय" के आरंभ और अंत होने की कल्पना करता है। वह यह नहीं देख पाता कि "समय" की उसकी कल्पना भी एक व्यक्ति-सापेक्ष घटना है, और यह व्यक्ति स्वयं भी एक घटना ही है जो उस वास्तविक "समय", जीवन या चेतना का एक सर्वाधिक छोटा अंशमात्र है, जिसमें ऐसे असंख्य व्यक्ति उनके अपने "व्यतीत होनेवाले समय" में पुनः पुनः व्यक्त होकर विलीन होते रहते हैं। यह व्यतीत होने वाला उसका "समय" उस आदि अंत रहित व्यतीत न होनेवाले "समय" से नितान्त अछूता और अनभिज्ञ भी होता है। इन दोनों परस्पर असंबद्ध "समयों" के बीच न तो कोई संपर्क और न ही कोई संबंध ही कभी हो सकता है, क्योंकि व्यक्ति-सापेक्ष "समय" वह "घटना" होती है, जो कि व्यक्ति के मस्तिष्क में उसके अपने उस "व्यतीत होनेवाले समय" के अन्तर्गत होती है जिसे न तो दूसरा कोई व्यक्ति जानता है, न जान ही सकता है। इस प्रकार "व्यतीत होनेवाला समय" वास्तविक "समय" का एक  विपर्यय भर होता है।

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्।।८।।

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः।।९।।

(पातञ्जल योगसूत्र समाधिपाद) 

विकल्प और विपर्यय की इस कसौटी पर व्यक्ति-विशेष का व्यतीत होनेवाला "समय" केवल अनुमान ही होता है और योगसूत्र -

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि।।७।।

(पातञ्जल योगसूत्र समाधिपाद) 

के अनुसार एक और वृत्ति-विशेष ही होता है।

यद्यपि वृत्तिमात्र का अवश्य ही प्रारंभ और अंत भी होता ही है, और जिस "समय" में यह होता है, वह "समय" भी उस व्यक्ति-विशेष के परिप्रेक्ष्य में ही हो सकता है, न कि उस "समय", जीवन या चेतना के परिप्रेक्ष्य में जिसका न तो व्यक्ति कभी अनुमान कर सकता है और न ही जिसे कभी जान सकता है।

वह व्यक्ति-निरपेक्ष, आदि और अंत के रहित "समय", जीवन और चेतना ही धर्म के ही पर्याय हैं। जबकि दूसरी ओर, समाज और सभ्यता ऐसे व्यक्तियों के समुदाय और समूह तथा उनकी मान्यताओं पर आधारित कोई विशिष्ट सभ्यता।

धर्म आदि-अंत से रहित समय, जीवन और चेतना है, जो कि सदैव अभी और मध्य में है। इसलिए उसे "सदैव" कहने का कोई अर्थ नहीं।

इस आदि-अंत से रहित समय, जीवन और चेतना का प्रवर्तन करनेवाला भी यही है, जो इससे अनन्य और अपृथक् है।

इसलिए किसी समुदाय में जिसे पाप या पुण्य कहा जाता है उसका इस आदि-अंत से रहित समय, जीवन और चेतना से कोई संबंध नहीं होता -

नादत्ते कस्यचित्पापं सुकृतं चैव न विभुः। 

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।१५।।

(गीता अध्याय ५)

धर्म ही एकमात्र आद्य (primordial) नित्य सत्य और इसलिए सनातन भी है, समाज और सभ्यताएँ अनित्य और विनष्ट होती रहनेवाली वस्तुएँ हैं।

*** 

 



Monday, 27 October 2025

Dark Night Of The Soul.

अज्ञ, विज्ञ, अभिज्ञ, और अनभिज्ञ

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जैसे ही कोई जैव-प्रणाली एक स्वतंत्र इकाई के रूप में अपने समग्र अस्तित्व में आती है, उसमें प्रसुप्त, प्रच्छन्न और अनभिव्यक्त जीव-चेतना में अपनी उस जैव इकाई को 'स्व' और उससे भिन्न जगत को 'पर' के रूप में जाना जाता है।

श्रवणकुमार ऐसा ही एक व्यक्ति था।

वह "मैं" था, जिसके माता-पिता दृष्टिहीन थे। पिता 'मन' और माता काया। 'मन' जो मननशील था और जिसका न आदि था और न अन्त। कोई नहीं जानता कि उसमें "समय" का जन्म हुआ था या "समय" में उसका।  किन्तु माता जिसे काया / का या कहते हैं, अवश्य ही "समय" में उसका जन्म हुआ था और "समय" में ही समाप्ति भी होगी, ऐसा उसे श्रवणकुमार समझता था। फिर भी उसे उसके माता-पिता के प्रति अगाध श्रद्धा थी और इसलिए वह चाहता था कि उन्हें सारे तीर्थों की यात्रा पर ले जाए। उसने एक काँवड का निर्माण किया और दोनों सिरों पर दो पलड़ों में माता-पिता को बिठाकर उन्हें तीर्थयात्रा पर ले गया। संसार में विद्यमान असंख्य जड-चेतन वस्तुओं की तरह श्रवणकुमार भी एक चेतन वस्तु या चेतना था, जिसे अपने अस्तित्व का भान था किन्तु संसार की अन्य असंख्य जड-चेतन वस्तुएँ इस भान से युक्त होते हुए भी अपने आपको "मन" या "काया" या उन दोनों का विशेष संयोग भर समझती थीं। संसार में सुख से रहने के लिए यह आवश्यक तो है ही। "मन" और "काया" मानों अंधे की तरह प्रकृति से प्रेरित और संचालित होकर संसार में जन्म से मृत्यु तक सतत गतिशील रहते हैं जबकि उन्हें जिस चेतना में जाना जाता है, वह आधारभूत चेतना न तो गतिशील और न ही अंधी होती है। इस पूरी गतिविधि के साथ चेतना अपनी आत्मा के भान से रहित नहीं होती है किन्तु उस अविकारी आत्मा को जाननेवाला, चेतना से अन्य, उसके अतिरिक्त कोई और कैसे हो सकता है! "मन" से निःसृत अपनी अभिज्ञा निरंतर "मैं" का उद्घोष करती भी है, किन्तु स्मृति उसे तुरंत ही किसी और प्रकार में रूपांतरित कर दिया करती है और तब मिथ्या "मैं" का आविर्भाव होता है। श्रवणकुमार इस पूरी गतिविधि के से परिचित था और जानता था कि यह सब प्रकृति के ही गुणों और कर्मों के फलस्वरूप घटित होता है ऐसा जान पड़ता है किन्तु वस्तुतः न तो आत्मा और न ही चेतना के अन्तर्गत कभी कुछ होता या हो सकता है। "समय" का रथ अहर्निश दसों दिशाओं में भ्रमण करता है और इसी "समय" का दूसरा एक नाम इसलिए दशरथ भी है। इस रथ पर आरूढ कोई काल-पुरुष है जो घने अंधकार में भी किसी भी ध्वनि को लक्ष्य कर उस पर अपने बाण  को चला सकता है। किन्तु यह तो प्रकृति की दैवी ह्येषा गुणमयी माया ही है जो गुणों और कर्मों के माध्यम से उस काल-पुरुष को भी किसी कर्मविशेष को करने के लिए नियोजित करते है और अज्ञानवश वह पुरुष अपने आपको उस कर्म का "कर्ता" मान लेता है -

गीता अध्याय ५

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। 

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।

नादत्ते कस्यचित्पापं सुकृतं चैव न विभुः।

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।१५।।

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितं आत्मनः।

तेषां आदित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत् परम्।।१५।।

श्रवणकुमार इस सत्य के दर्शन कर कर्तृत्व की भावना से रहित हो चुका था और इसलिए उस रात्रि में जब वह प्यासे माता-पिता की प्यास बुझाने के लिए उस सरोवर से पानी लेने गया और जब काल-पुरुष ने राजा दशरथ की बुद्धि को भ्रमित कर उसे पानी पी रहा पशु समझकर उस पर अपना शब्दभेदी बाण चला दिया था तो नियति के इस नाटक पर वह क्षण भर के लिए स्तब्ध हो उठा था और जब राजा दशरथ शब्दभेदी बाण के द्वारा मारे गए  श्रवणकुमार तक पहुँचे और उसे विस्मय तो हुआ किन्तु दशरथ के रूप में उसके समक्ष प्रस्तुत उस काल-पुरुष से उसने कहा -

"हे राजन्! तुम व्याकुल मत होओ। पहले तुम जल लेकर मेरे प्यासे माता-पिता के पास जाओ, पहले उनकी प्यास बुझाओ, और फिर जैसा भी तुम्हें उचित जान पड़े वैसा करो।"

इतना कहकर श्रवणकुमार ने प्राण त्याग दिए।

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Tuesday, 21 October 2025

THE SECOND PERSON

श्रीमद्भगवद्गीता  

4/1, 4/2, 4/3, 4/5, 7/10, 7/19, 10/2, 10/ 14,

अध्याय ४ -

श्रीभगवानुवाच -

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। 

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।१।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। 

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।२।।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनम्।

भक्तो मेऽसि सखा चेति रहस्यमेतदनुत्तमम्।।३।।

अर्जुन उवाच -

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।

कथं चेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।४।।

श्रीभगवानुवाच -

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। 

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।५।।

अध्याय ७ -

श्रीभगवानुवाच  -

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।

बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।।१०।।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। 

वासुदेवः सर्वमिदं स महात्मा सुदुर्लभः।।१९।।

अध्याय १० -

श्रीभगवानुवाच -

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं च महर्षयः। 

अहं आदिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।।२।।

अर्जुन उवाच -

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।

न हि ते भगवन्  व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः।।१४।।

स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।

भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते।।१५।।

श्रीभगवानुवाच -

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।

प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ न अन्तो विस्तरस्य मे।।१९।।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। 

अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्तमेव च।।२०।।

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।

मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।।२१।।

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः। 

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानां अस्मि-चेतना।।२२।।

अध्याय ११ -

नाहं वेदैर्न तपसा न दानें न चेज्यया। 

शक्यं एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा।।५३।।

कठोपनिषद् 

1/

बहूनामेमि बहूनामेमि मध्यमः।

This is how I interpret the essence of Gita and the Truth of :

The First Person, 

The Second Person, and,

The Third Person.

The self-conscious self is the

अस्मि-चेतना

Referred to as in the verse 22, Chapter 10 above.

This is the esential First Person while the Sense of "I am" as I'm s this or that, or not this; not that ... is the Second Person.

The "self" can never address to itself  either as "I", nor as "You".

Again, The "Self" couldn't be pointed out as "I", "You" or "That" as is addressed as an object. "Self" is inevitably either the First Person or the Second Person, who are referred to or addressed as "I" or "You" invariably.

The reference to

the mantra in the Kathopanishad

Gives the same sense.

बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमो ...

नचिकेता / nachiketA asks to  वाजश्रवा  / VAjashravA.

In many, one  a conscious being is always and inevitably referred to either as "I" or as 'You" only and could never as "That".

"That" - तत्  is the  ब्रह्मन्  / Brahman, 

As is referred to in the  महावाक्य :

अहं ब्रह्मास्मि /  I AM THAT.

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Monday, 20 October 2025

THE TILT.

अष्टमांश / आठ पहर का गणित

रात्रि का अंतिम प्रहर अर्थात् मध्यरात्रि के 12:00 से अगले दिन की सुबह 03:00 तक समय। अभी 02:09 a.m.  का समय है। दिन और रात्रि के चौबीस घंटों को कुल आठ भागों में विभाजित करने पर जो समय प्राप्त होता है, उसे एक प्रहर कहते हैं। सूर्य की दैनिक गति के आधार पर निर्धारित एक समयावधि है। सूर्य की दैनिक गति के अनुसार पृथ्वी के सूर्य के चतुर्दिक् अपनी कक्षा में एक पूर्ण परिभ्रमण करने के समय को एक सौर वर्ष कहा जाता है। पृथ्वी की दूसरी अयन गति उसके अपने अक्ष पर झुके होने के कारण उत्तरायण और दक्षिणायन के रूप में होती है। पृथ्वी के इस प्रकार से अपने अक्ष पर घूमने से पृथ्वी के किसी स्थान पर सूर्योदय और सूर्यास्त होते हुए दिखलाई देते हैं। इस प्रकार सूर्यास्त से सूर्यास्त तक का समय जो दैनिक आधार पर वैसे तो चौबीस घंटे की अवधि का होता है, किन्तु व्यावहारिक गणना दृष्टि से दिन और रात्रि की अवधि शीत ऋतु और ग्रीष्म ऋतु में भिन्न भिन्न होती है, और सूर्य के उत्तर अयन और दक्षिण अयन के बीच अधिकतम कोणीय अंतर 47 अंश होता है जिसका आधा भाग सार्द्ध / साढ़े 23 अंश, पृथ्वी जिस कोण पर अपने उत्तर-दक्षिण अक्ष पर झुकी होती है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि यांत्रिक घड़ी में बैलेंस व्हील से संबद्ध लीवर होता है, जिसे फिर और समायोजित किया जा सकता है। शायद इस घड़ी का आविष्कार करनेवाले को इसका आभास रहा होगा या वह इसी से प्रेरित हुआ हो! गुरु गोरक्षनाथ जी ने इसी आधार पर एक प्रहर की तीन घंटे की अवधि को पुनः आधा कर डेढ़ घंटे के समय का एक चौघड़िया और दिन के आठ तथा इसी तरह से रात्रि को भी आठ चौघड़िया में विभाजित किया होगा। रोचक तथ्य यह है कि सात दिनों को आधार मानकर आठ चौघड़िया :

उद्वेग चर लाभ अमृत काल शुभ और रोग 

निर्धारित किए गए जो कि प्रति बारह घंटों में एक चक्र में घूमते हैं। प्रत्येक दिन का और रात्रि का भी प्रथम और अंतिम चौघड़िया समान होता है। उदाहरण के लिए :

उद्वेग, चर, लाभ, अमृत, काल, शुभ, रोग और पुनः उद्वेग प्रति रविवार के दिन के प्रथम और अन्तिम चौघड़िया होते हैं। इसी प्रकार :

शुभ अमृत चर रोग काल लाभ उद्वेग और पुनः शुभ प्रति रविवार के रात्रि के चौघड़िया होते हैं।

इस तरह से किसी शुभ या अशुभ कार्य को करने के लिए किसी भी दिन या रात्रि का उचित चौघड़िया को समझा जा सकता है। और यह अनुमान भी किया जा सकता है कि कौन से चौघड़िया में होने या किए जानेवाले कार्य के परिणाम में क्या फल प्राप्त होता है। 

एक घटिका / घड़ी की अवधि २४ मिनट, और दो घड़ी का समय मुहूर्त कहा जाता है। इस प्रकार एक मुहूर्त की अवधि ४८ मिनट की होती है।

इस आधार पर विश्व के किसी स्थान पर हो रही किसी घटना के दूरगामी परिणामों का भी अनुमान लगाया जा सकता है।

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Monday, 29 September 2025

The Seed

जिज्ञासा : बीजमंत्र क्या होता है, कभी समय मिले तो इस विषय पर अपने ब्लॉग में प्रकाश डालिएगा।

उत्तर : संस्कृत भाषा में निम्नलिखित ३३ बीजाक्षर अर्थात् मूल वर्ण होते है -

क ख ग घ ङ

च छ ज झ ञ

ट ठ ड ढ ण

त थ द ध न

प फ ब भ म

य र ल व श

ष स ह

इनके साथ कोई लघुप्राण या महाप्राण स्वर लगाने पर बीजमंत्र बनता है।

ये ३३ वर्णाक्षर ही ३३ कोटि के देवता हैं। स्वर ही प्राण हैं।  प्राण (शक्ति) और चेतना (ज्ञान) मिलने पर ही देवता तत्व सक्रिय हो सकता है। एक विशेष वर्ण ॐ है जिसमें केवल स्वर होते हैं।

इस प्रकार कोई बीजाक्षर या बीजमंत्र उस विशिष्ट देवता का मंत्रात्मक स्वरूप होता है, जिसके और भी नाम हो सकते हैं जैसे

ॐ गं गणपतये नमः।। 

इस मंत्र में ॐ व्याहृति है, गं बीजाक्षर या बीजमंत्र है जिसका देवता गणपति है।

इस प्रकार कोटि कोटि मंत्र हैं।

यदि संस्कृत के मूल वर्णों के स्थान पर लौकिक वर्णों का प्रयोग किया जाए तो ऐसे भी बहुत मंत्र हर भाषा में पाए जाते हैं। उनके देवता भी आधिभौतिक होते हैं न कि आधिदैविक जो कि ३३ कोटि के होते हैं। इन्हें डाबर, शाबर, डाकिनी, शाकिनी कहा जाता है। इनकी संख्या अनगिनत है।

सवाल यह है,

आप इस जानकारी का क्या उपयोग करेंगे?

संस्कृत भाषा  में "सीद्" धातु का प्रयोग "बैठने" के अर्थ में होता है जैसे गीता अध्याय १ में दृष्टव्य है -

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यते।

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।।२९।।

अंग्रेजी के  sit, sedan, sedantery,  इसी के सज्ञात / सजात,  अपभ्रंश  cognate  हैं। 

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Saturday, 27 September 2025

Name and Form

नाम-रूपात्मकमिदं

नाम-रूपात्मकमिदं यच्च श्रूयते दृश्यते वा सर्वम्।

जागृतिस्वप्नसुषुप्त्यां वृत्तिरूपात्मके जगति।।१

नाम श्रूयते ध्वनिभिः रूपं दृश्यते आकृतिभिः।

द्वयोर्संघातं प्राणश्चेतनाद्वयी गमयति अत्र तत्र।।२।।

रंध्रमये अस्मिञ्जगति विचरत्यसौ कालस्थाने।

देहे नाडीभिर्मनसि वृत्तिभिः आत्मभिश्च हृदये।।३।।

अतो हि लोके लोके मनसि नामरूपौ वर्तेते।

यथा हि सर्पिणी संचरति विचरति बिलसहस्रे।।४।।

एवं नाड्यां नाड्यां सहस्र्यां सञ्चरति यत्र तत्र

तथा हि जीवो अनुसरति संचरति जगति रंध्रे।।५।।

एको हि रंध्रं व्याप्तं अपि सहस्रेषु रंध्रेषु तेषु।

ब्रह्मरंध्रमुच्यते इति नाम्ना ज्ञायते कथ्यतेऽपि।।६।।

व्यष्टिः पिण्डे पिण्डं ब्रह्माण्डे, ब्रह्माण्डं ब्रह्मणि।

जन्मनि जन्मनि गच्छति विरति सञ्चरति।।७।।

क्लेशं भजत्यनुभूयते अनुभवत्यपि सर्वत्र।

वा अपि ब्राह्ममुहूर्ते लब्ध्वा व्यावृत्तं ब्रह्मरंध्रम्।।८।।

प्रविशत्यनवधाने तत्र यदा सुषुप्तिमपि कदापि। 

अथ वा अवधानं भजत्वा यदा ब्रह्मरंध्रे तदापि।।९।।

न पुनरावर्तति अस्मिञ्जगति मनसि वा पिण्डे।

प्रलीयते तस्मिन् ब्रह्मणि एवं तथा ब्रह्मभूत्वा।।१०।।

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Friday, 26 September 2025

The Desires

इच्छा की उम्र 
गीता अध्याय ७
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं -

हे अर्जुन! सभी भूत प्राणी उनके अपने संसार में इच्छा और द्वेष से ही प्रेरित / बाध्य होकर किसी  व्यक्ति-विशेष के रूप में जन्म लेते हैं। अर्थात् हर कोई इस प्रकार उसके अपने जन्म से ही किसी न किसी इच्छा को साथ लेकर ही जन्म लेता है और जीवन में किसी समय पर उसे और अधिक जीते रहने की इच्छा नहीं रह जाती है। तात्पर्य यह कि यद्यपि वह मर जाना तो नहीं चाहता पर उसकी कोई ऐसी इच्छा फिर भी शेष रह जाती है जो अपूर्ण रह गई होती है। उसकी जो भी ऐसी इच्छाएं अपूर्ण रह जाती हैं, वे सभी मृत्यु आने पर मर जाती हैं, या उनमें से कुछ या कम से कम एक यह इच्छा तो रह ही जाती है कि मुझे पुनः जन्म लेना है। इसी प्रकार जिन किन्हीं वस्तुओं और स्थितियों से वह असंतुष्ट होता है, उनसे उसे फिर सामना न करना पड़े, उसकी यह इच्छा भी शेष रह जाती है, क्योंकि इन इच्छाओं की उम्र उसकी उम्र से अधिक होती है। यदि मृत्यु होने के समय उसकी सभी इच्छाएं समाप्त हो जाती हों, तो फिर उसके पुनः जन्म लेने की संभावना भी समाप्त हो जाती है। तब वह परमात्मा में विलीन हो जाता होगा और उस व्यक्ति की तरह शेष नहीं रह जाता होगा जिसका पुनः जन्म (और मृत्यु) हो सके। शायद इसे ही मुक्ति या मोक्ष कह सकते हैं।
***

Thursday, 25 September 2025

~~ UNTITLED ~~

Caption this!


यहाँ की आग तुम तक भी तो पहुँचेगी जरूर, 

जलाओ इससे अपना घर, या तुम अपना दिया!!

*** 

Saturday, 20 September 2025

WORD IS THE WORLD.

P O E T R Y

--

There Is The Void,

The Great Endless and,

The Beginningless Vast,

Where There Is, 

Neither The World,

Nor The Word,

And The Attention Only, 

Reins Supreme.

Neither Lonely, Nor Alone,

For It Knows Nothing, 

Apart From Itself.

But Then In An awkward Moment,

Appears The Twin, 

The Word And The World,

Entwined Together, 

So Close, So Distant, 

From One-Another,

Like A Twin-star In The Dark Sky. 

And One Tends To Believe, 

The Two Are But One And The Same.

As The One Appears, 

The Another is List Of Sight, 

And One Just Forgets, 

The Two Are But One! 

Just Like You,

I Too Have Heard,

In The Beginning,

There Was But God (Alone?),

I Just Wander,

If God (Alone?) Was There,

Wasn't There The Other, 

The So-called Past!,

Beside The God? 

So I Think,

There Is Nver, 

Either A Past, 

Or A Future,

That Was Or Will Be Ever! 

And The God Utters A Word, 

In His Extreme Utter Solitude, 

And The Word Appears,

And At Once Becomes The World. 

And Though,

The Word Replicates Itself, 

In Infinitely, A Myriad Forms,

It's None Other Indeed, 

The God (Alone?).

Replicating Himself

Time And Again, 

Moment To Moment. 

The Moment, The Word, 

And The World Too, 

Appear And Disappear,

And The God Too Apoears

And Disappears With Them!

It's The One-Man Show, 

That Appears To Go on, 

Endless And Beginningless.

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। 

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्तत्वदर्शिभिः।।१६।।

(गीता अध्याय २)

सर्वमिदं अतो हि वासुदेव यत्किञ्च जगत्यां जगत्।। 

(UN-EDITED)

***






 


Friday, 19 September 2025

ANAMETACATA.

Jungle House Scrolls

This is perhaps the third and the last Jungle House in my life. 

They visit me, and I really don't know exactly Who brought me here for what purpose.

When they visit me there may be reason for them, but I just meet them with no objections any. I'm neither disturbed nor bothered. Occasionally someone puts a question about why I'm here, what is my purpose behind coming and staying here. I smile but say nothing. Thinking about me they too just keep silent.

I try not to interfere in their activities. Still they keep asking me, and I tell them whatever I feel like telling.

This midnight I coined a new word :

ANAMETACATA

It's perhaps an acronym, made up of three prefixes.

Ana is about analogy, analysis,

Meta is about Meta, Metal,

Cata is about Catalysis.

Here my role consists in helping them perform their work in as much in good way as they can.

Whenever and if they ask, I do tell them what I feel like telling.

So I play the role of an analyst.

Then I try to understand what help they may expect from me and I suggest them whatever I think is proper, and should be done at the material, Metaphysical, Meta - elemental Metal level.

Then though I may look participating in their activities, I am quite unconcerned and unattached.

My role is perhaps that of a Catalyst - a substance that helps in furthering and happening of a chemical process but it is not sure if it is really involved in; takes part in it.

I assembled these three words in a single word  - ANAMETACATA.

I AM ALIVE.

***