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Wednesday, 12 November 2025

The Funeral.

दोहराव 

कविता

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सबके ही हैं हाथ बन्धे,

अपने स्वार्थ में सब अन्धे,

सबकी अपनी शवयात्रा है,

खुद को ही सब देते कन्धे।

बाँया कभी, कभी दाहिना,

दोनों ही कन्धे दुखते हैं,

अदल बदल कर चलते हैं,

इसी बीच कुछ रुकते हैं, 

जब आ जाती है मंजिल,

कुछ इंतजार भी करते हैं,

फिर सब जल्दी से हो जाए, 

उम्मीद यही सब करते हैं।

घर पर लौट, स्नान विश्राम,

फिर उठकर बाकी के काम, 

फिर अगले दिन की तैयारी,

फिर अगले दिन भी यही काम!

यूँ ही तो हर दिन होता है,

इंसान सुबह को उठता है,

थककर रात, सो जाता है,

इंसान ही क्या, उसकी दुनिया,

दुनिया से यही तो नाता है!!

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Monday, 3 March 2025

Indo-Specific

ऐन्दव-आख्यान 

क्या हिन्दू धर्म है?

अंग्रेजों के जमाने से ही यह भ्रान्त अवधारणा प्रस्तुत और स्थापित की गई है कि

हिन्दू

शब्द की उत्पत्ति मूलतः 'सिन्धु' शब्द के अपभ्रंश के रूप में हुई है।

'सिन्धु' शब्द का प्रयोग और उल्लेख वेदों में दो अर्थों में पाया जाता है पहला सिन्धु अर्थात् समुद्र के रूप में और दूसरा समुद्र जैसी विशालाकार नदी की तरह। 

किन्तु मेरा विचार / मत यह है कि

हिन्दू

शब्द की उत्पत्ति

इन्दु 

अर्थात् उस शब्द से हुई है जो चन्द्रमा का पर्याय है।

और हिन्दू या इन्दु धर्म केवल भारत-भूमि पर ही नहीं, इन्दोनेशिया / इन्डोनेशिया तक प्रचलित था / है।

इसे तो मैं नहीं जानता कि 

ऐन्दव आख्यान

का वर्णन किस ग्रन्थ में है, क्योंकि मुझे बस यही स्मरण है कि इसका उल्लेख किसी न किसी प्राचीन ग्रन्थ में है, जिसके बारे में मैंने किसी समय पढ़ा है।

इस विषय में गहराई से शोध किया जाए तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि ऐन्दव शब्द संस्कृत इन्दु से अर्थात् 'चन्द्रमा' से व्युत्पन्न है।

और सूर्य तथा चन्द्रमा तो वैदिक ज्यौतिष् का आधार हैं। सूर्य और चन्द्रमा दोनों ही वैदिक पञ्चाङ्ग में कालगणना के नियामक हैं।

इस प्रकार हिन्दु / हिन्दू, उसी धर्म की प्राचीन संज्ञा है जिसे सनातन या सनातन धर्म भी कहा जाता है।

एक प्रख्यात फ्रैन्च भविष्यवेत्ता नॉस्ट्रेडेमस की किसी भविष्यवाणी में भारतवर्ष का उल्लेख 

धर्म के नाम वाले समुद्र के देश

के रूप में किया गया है जिसका अभ्युत्थान इक्कीसवीं शताब्दी में होगा। 

***




 


Monday, 11 March 2024

एक हिन्दी कहानी

खूँटी की आत्मकथा

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उस जंगलनुमा वातावरण में जहाँ कभी कभी मैं इधर उधर यूँ ही घूमा करता था, एक वृद्ध संत या साधुनुमा व्यक्ति रहा करते थे। चूँकि यह कथा 30 वर्षों से भी पहले के समय की है इसलिए उनके बारे मेंं इतना भर कह सकता हूँ कि उनका नाम तो मुझे किसी ने कभी नहीं बतलाया, लेकिन उनका कुलनाम था - "पाठक"। नर्मदा तट पर ओंकारेश्वर मन्दिर से चार सम्प्रदाय मठ की दिशा में और आगे गायत्री मन्दिर से आगे, नर्मदा-कावेरी के दूसरे संगम की तरफ जाते हुए जरा पहले बाईं तरफ उनकी कुटिया थी, जहाँ वे निवास करते थे। वे संभवतः किसी सम्प्रदाय-विशेष में दीक्षित नहीं थे और सरल भाव और शुद्ध हृदय से नर्मदा-तट पर निवास करनेमात्र को ही समर्पित और उसमें ही संतुष्ट प्रतीत होते थे।

जैसा कि प्रचलन था, वहाँ अनेक छोटे-बड़े महात्माओं ने अपने अपने आश्रम स्थापित कर रखे हैं जहाँ उनके भक्त उन आश्रमों में उनसे मिलने प्रायः आते रहते थे। किन्तु मुझे याद नहीं आता है कि पाठक जी से मिलने के लिए किसी को आते हुए मैंने शायद ही कभी देखा हो।

मैं जहाँ रहता था वह स्थान इंदौर के एक महात्माजी ने "माता आनन्दमयी तपोभूमि" के नाम से आश्रम के रूप में स्थापित किया था। आज उन महात्मा या उस स्थान के विषय में मैं अधिक कुछ नहीं जानता।

जब वर्ष 1991 की फरवरी 11 की शाम वहाँ पहुँचा था तो जल्दी ही रात्रि का भोजन कर सो गया था। दूसरे ही दिन महाशिवरात्रि होने से मान्धाता नामक उस पर्वत की परिक्रमा पर चला गया जिसके एक ओर से नर्मदा नदी तथा दूसरी ओर से कावेरी नदी आकर परस्पर मिलती हैं और उनका संगम जहाँ होता है, फिर पुनः पर्वत के दोनों ओर दो भागों में बँट जाती हैं, किन्तु आगे चलकर बाद में पुनः दूसरे संगम में आपस में मिल जाती हैं।

उस दूसरे संगम की दिशा में अकसर सुबह शाम घूमने या स्नान के लिए जाया करता था तो उनसे परिचय हो गया था। ऐसे ही एक दिन उन्होंने अपनी कुटिया पर बुलाया तो वहाँ चला गया। एक छोटा साफ सुथरा कमरा और उससे भी छोटा किचन। शौचालय कहीं नहीं। उन दिनों वहाँ किसी भी आश्रम में केवल वी.आई.पी. अतिथियों या महन्तों के लिए ही व्यक्तिगत शौचालय हुआ करते थे। मैंने उनसे पूछा :

"आपने अपने यहाँ शौचालय क्यों नहीं बनाया?"

तब उन्होंने मुझे यह कथा सुनाई :

ऐसे ही किसी स्थान पर एक महात्मा अपनी एक छोटी सी कुटिया बनाकर रहते थे और भजन करते थे। किन्तु उनके जिस निवास स्थान के दरवाजे पर ताला लगाया जाता था वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे चोर चुरा ले जा सकते थे। बहरहाल वहाँ दीवार पर एक खूँटी अवश्य थी जिस पर वे उनकी कुटिया के दरवाजे पर लगनेवाले ताले की चाबी टाँग दिया करते थे।

एक दिन उनसे मिलने के लिए कोई आगन्तुक जिज्ञासु जब आया तो कौतूहलवश उसने उनसे पूछा :

"बाबाजी, यह चाबी आपके किस काम आती है?"

महात्माजी बोले :

"ऐसा है इस उम्र में मेरी याददाश्त बहुत कमजोर होने लगी है और एक बार जब अपनी इस कुटिया से बाहर चला जाता हूँ तो भूल जाता हूँ कि लौट कर कहाँ जाना है। इस चाबी से मुझे यह स्थान याद रहता है और इसका बस इतना ही काम है।"

"और अगर किसी वजह से चाबी खो जाए तो?"

"हाँ,  यह भी हो सकता है, लेकिन इतने समय से यहाँ बार बार आते रहने से अब पैर भी बहुत अभ्यस्त हो गए हैं, और मैं कहीं भी चला जाऊँ मेरे पैर मुझे स्वयं ही यहाँ खींच ले आते हैं।"

"फिर खूँटी का क्या प्रयोजन है?"

"उसका प्रयोजन यह स्मरण कराना है कि शरीर स्वयं ही वह चाबी है जो कि मनरूपी खूँटी पर टँगी रहती है, और मनरूपी यह खूँटी स्वयं भी किसी ठोस दीवार पर न लगी हो तो शरीर और मन दोनों ही भटक जाते हैं।"

"और वह ठोस दीवार क्या है?"

जिज्ञासु ने प्रश्न किया। 

"वह दीवार है नित्य रहनेवाला स्वाभाविक भान जिसे चेतना भी कहा जाता है।"

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Monday, 31 October 2022

एको विशुद्ध बोधोहमिति

अष्टावक्र गीता

अध्याय १

श्लोक ८

एको विशुद्ध बोधोहमिति निश्चय वह्निना।।

प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव।।८।।

अर्थ :

आत्मा (के अर्थ में) मैं, दृष्टा-दृश्य के द्वैत से रहित विशुद्ध बोध हूँ इस निश्चयरूपी अग्नि से अपने गहन अज्ञान को जलाकर शोक से रहित हो जाओ और सुखी हो रहो।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧

ಶ್ಲೋಕ ೮

ಏಕೋ ವಿಶುದ್ಧ ಬೋಧೋऽಹಮಿತಿನಿಶ್ಚಯವಹ್ನಿನಾ ||

ಪ್ರಜ್ವಾಲ್ಯಾಜ್ನಾನಗಹನಂ ವೀತಶೋಹಃ ಸುಖೀ ಭವ||೮||

Ashtavakra Gita

Chapter 1

Stanza 8

Burn down the wilderness of ignorance with the fire of the knowledge : "I am the One and Pure Intelligence," and be free from grief and be happy!

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