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Wednesday, 12 November 2025

The Funeral.

दोहराव 

कविता

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सबके ही हैं हाथ बन्धे,

अपने स्वार्थ में सब अन्धे,

सबकी अपनी शवयात्रा है,

खुद को ही सब देते कन्धे।

बाँया कभी, कभी दाहिना,

दोनों ही कन्धे दुखते हैं,

अदल बदल कर चलते हैं,

इसी बीच कुछ रुकते हैं, 

जब आ जाती है मंजिल,

कुछ इंतजार भी करते हैं,

फिर सब जल्दी से हो जाए, 

उम्मीद यही सब करते हैं।

घर पर लौट, स्नान विश्राम,

फिर उठकर बाकी के काम, 

फिर अगले दिन की तैयारी,

फिर अगले दिन भी यही काम!

यूँ ही तो हर दिन होता है,

इंसान सुबह को उठता है,

थककर रात, सो जाता है,

इंसान ही क्या, उसकी दुनिया,

दुनिया से यही तो नाता है!!

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Friday, 5 January 2024

The Book Of Mormon

A Chapter from the UpaniShad. 

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मृयमाण / Mormon 

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आसीत् कस्मिंश्चित्काले 

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आसीत् कस्मिंश्चित्काले  स एकोऽद्वितीयो यत्र कालोऽपि न बभूव ह। यतो हि तत्र कालोऽपि नासीत् किं तत्र अयं लोको यत्र वयं अद्य।। 

तस्मिन एकस्मिन्नेव प्रच्छन्नासीत् कालो। एकोऽद्वितीये प्रथमः बभूव ब्रह्मा।  तस्मिन्प्रकटे ब्रह्मणि लोकः अयम्।। 

ते देवाः देवताः अमराः अमृयमाणाः वा।।

तेऽपि नित्याः जन्ममृत्युभ्यां अस्पृष्टाः।। 

एकाः अपि सन् बहवः।।

ततो पञ्चमहाभूतानि बभूवुः।।

एकैकस्य अर्धं गृहीत्वा अर्धस्य चतुर्धा विभक्त्य एकार्धाशेन सह अन्यस्य चतुर्थांशान् संयुज्य बभूवतुः पञ्चस्थूलभूतानि।।

एतेभिः स्थूलजगत्प्रपञ्चम्।।

अस्मिन् लोके मृयमाणः हि मनुजः।।

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इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।।

विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।१।।

(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4)

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And a freeway bill-board,

Directing the Path to it :



06-01-2024. 02:22 A. M. 

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