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Wednesday, 12 November 2025

The Funeral.

दोहराव 

कविता

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सबके ही हैं हाथ बन्धे,

अपने स्वार्थ में सब अन्धे,

सबकी अपनी शवयात्रा है,

खुद को ही सब देते कन्धे।

बाँया कभी, कभी दाहिना,

दोनों ही कन्धे दुखते हैं,

अदल बदल कर चलते हैं,

इसी बीच कुछ रुकते हैं, 

जब आ जाती है मंजिल,

कुछ इंतजार भी करते हैं,

फिर सब जल्दी से हो जाए, 

उम्मीद यही सब करते हैं।

घर पर लौट, स्नान विश्राम,

फिर उठकर बाकी के काम, 

फिर अगले दिन की तैयारी,

फिर अगले दिन भी यही काम!

यूँ ही तो हर दिन होता है,

इंसान सुबह को उठता है,

थककर रात, सो जाता है,

इंसान ही क्या, उसकी दुनिया,

दुनिया से यही तो नाता है!!

***








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Sunday, 22 September 2019

भाषा-विधा / भाषा-विद्या

तअव्वुन, तअय्युन, तख़य्युल 
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मैं नहीं जानता कि ये तीन शब्द उर्दू, फारसी या अरबी तथा उनसे मिलती-जुलती भाषाओं में कहाँ तक और किस अर्थ में सार्थक हैं, लेकिन मुझे लगता है कि इनकी संस्कृत व्युत्पत्ति कुछ यूँ हो सकती है :
तर, तल, तम,
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त - ,
अव - ,
उन - ,
त - ,
अय - ,
उन - ,
त,
खयि,
उल् / उल,
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इसी तरह का एक शब्द है :
अव्वल ;
जिसकी संस्कृत व्युत्पत्ति
अव - अल/ अल्
की तरह की जा सकती है।
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भाषा-विधा  / भाषा-विद्या