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Friday, 26 December 2025

KALKI

Hindi Poetry

हिन्दी कविता

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कर रहे हैं कल्कि कलरव

भीत दैत्य, भीत दानव,

भीत राक्षस, भीत मानव!

ओतप्रोत भय से जन जन,

भीत देव, भीत असुर,

भीत यक्ष, पिशाच भी,

मोह-पीड़ित, विश्व सारा,

आतंकित, आशंकित!

कर रहे भविष्यवाणी,

ज्योतिषी, भविष्यवेत्ता,

रहस्यदर्शी भी हैं अभी,

किन्तु किसे है सच पता,

अनुमान करते हैं सभी!

आगमन की है प्रतीक्षा,

आगमन होना है जिनका,

वे राम हैं या कृष्ण हैं,

रुद्र हैं या कल्कि हैं,

किन्तु कंपन वायु में है,

कंपित दिग्-दिगन्त है,

भीत जगत् जड चेतन,

भीत सन्त-महन्त हैं!

और किसी अप्रत्याशित,

नितान्त ही अनपेक्षित,

क्षण पर अतिथि आएँगे,

करते हुए आश्चर्यचकित!!

अधर्म से न होना मोहित,

अज्ञान से न होना भ्रमित,

कर्तव्य में संलग्न रहना,

अविचलित, प्रमादरहित!

***








 


 

Sunday, 14 January 2024

कल का सपना

कविता : 23 06 2023

कल का सपना कुछ अजीब था, 

न कोई दूर था, और न ही, क़रीब था!

एक माहौल वो, जिसमें कि मैं भी था,

मेरे जैसा ही उन सबका भी नसीब था।

वैसे हर कोई ही था ही बहुत दौलतमंद,

हर कोई ही, लेकिन बहुत गरीब था!

कोई नाकामयाब या फिर था कामयाब,

कोई शायर, कोई रिसाला-ए-अदीब था।

कोई नज़ूमी था तो और कोई था नद़ीम,

कोई किसी का दोस्त, कोई रक़ीब था।

सपना भी टूट गया, नींद भी टूट गई, 

टूट गया वो भी, जो वक्त का ज़रीब था!

***






Wednesday, 21 September 2022

Flutterfly

Butterfly

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कविता / 21-09-2022

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तुम कितनी मेहनत करते हो! 

लेकिन फिर थक जाते हो! 

क्या क्या नहीं कमाते हो! 

लेकिन फिर थक जाते हो!

कुछ उम्मीदें, कुछ सपने, 

कुछ दुश्मन, दोस्त अपने, 

हर दिन नये बनाते हो, 

लेकिन फिर रुक जाते हो।

दौलत, शोहरत, ताकत, किस्मत,

क्या क्या नहीं कमाते हो,

लेकिन फिर थक जाते हो। 

फिर तुम जश्न मनाते हो,

जलसा हर रोज़ मनाते हो,

फिर उससे भी थक जाते हो, 

खा-पीकर सो जाते हो! 

उस मकड़ी को देखो वह, 

करती है रोज़ शिकार नया,

बुनती है रोज़ ही जाल नया, 

पर रोज़ जाल टूट जाता है,

फिर करती है शुरू, काम हर रोज़,

उस बकरी को देखो वह,

दिन भर चारा चरती है, 

क्या वह मेहनत करती है,

करती है आराम हर रोज़! 

इस तितली को देखो, यह 

दो-चार दिनों तक जीती है,

फूल फूल पर मँडराती है,

बून्द बून्द मधु पीती है!

क्षणभंगुर जीवन उसका, 

पर बड़ी शान से जीती है!

क्या वह मेहनत करती है?

क्या वह फिर थक जाती है? 

तुम कितनी मेहनत करते हो, 

लेकिन फिर थक जाते हो, 

यूँ ही हर दिन जीते जीते, 

लेकिन आखिर मर जाते हो!

इतनी मेहनत क्यों करते हो,

ये भी तो खुद से पूछो,

थोड़ा सा तो आराम करो, 

खुशी खुशी जीवन जी लो!

***




Tuesday, 2 August 2022

अस्तित्व एक रहस्य!

कविता : 01-08-2022

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यह जो है!!

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न तो यह कुछ भी है नया, न तो कुछ भी है पुराना, 

न तो कुछ भी नया हुआ है, न तो कभी भी था पुराना, 

तो आखिर ये सब क्या है, जो भी यह सब हो रहा है,

तो क्या ये है कोई सपना, या फिर सिर्फ, अफ़साना!!

ये जो है यह अपनी दुनिया, अपना ज़माना, जो भी  है,

क्या है ये भी सिर्फ सपना, है अजब, ये सारा ही अफ़साना,

क्या यह सब वही नहीं है, जो कि यह सब कुछ हो रहा है,

किसको सही पता है आखिर, है इसको किसने जाना!!

ये जो कि खुद ही हूँ मैं, या जो कुछ भी मन है मेरा,

क्या खुद मैं भी हूँ इसका, क्या खुद या मन है ये मेरा,

आखिर मैं खुद ही मन हूँ, या क्या मन भी कोई मेरा, 

किसको पता है आखिर, है इसको किसने जाना!!

क्या दुनिया ही खुद है मैं, और दुनिया खुद ही है मन, 

मन ही खुद है, ये सारा सब कुछ, क्या मैं ही दुनिया,

यहाँ जो कुछ भी हुआ है, या जो नज़र आ रहा है, 

जो कुछ कभी भी होगा, या फिर जो कि हो रहा है!!

क्या सिर्फ मैं ही बदल रहा हूँ, या मन भी बदल रहा है,

या फिर यह बदल रही है, जो भी मेरी है, ये दुनिया।

कुछ भी जो है बदलता, क्या वह वक्त ही नहीं है,

लेकिन क्या वक्त भी यह, सचमुच कभी बदलता!

या ये भी बस भरम है कि सब कुछ बदल रहा है,

जिसको भी है भरम ये, क्या वो भी बदल रहा है! 

ये बदलना, -न बदलना, ये भी तो है खयाल ही,

मजे की बात तो है कि, खयाल भी, बदल रहा है! 

तो, क्या मैं ही बदल रहा हूँ, या मन भी बदल रहा है,

ये दुनिया बदल रही है, या फिर वक्त ही बदल रहा है,

किसको पता है आखिर, है इसको किसने जाना!

जो कुछ भी हमने माना, वो सब तो बदल रहा है,

जो कुछ भी हमने जाना, वो सब तो बदल रहा है,

तो सवाल बस यही है, आखिर ये 'जानना' भी,

किसको पता है आखिर, है इसको किसने जाना!

जरा गौर कीजिए भी, ये जानना भी क्या है, 

क्या ये कभी बना है, क्या ये कभी मिटा है,

क्या ये बनकर है मिटता, या बनता है मिटकर,

क्या यह कभी पुराना, या फिर कभी नया है!

किसको पता है आखिर, है इसको किसने जाना,

क्या ये भी खयाल है कोई, जिसको है हमने माना,

यह सब में ही हुआ करता, है यह जो हमेशा ही,

यह जानने-वाला भी क्या हमेशा ही नहीं होता,

किसको पता है आखिर, है इसको किसने जाना!! 

***


Monday, 4 December 2017

कुछ भी! कविता

कुछ भी!
कलर-ब्लाइन्ड !
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सौन्दर्य,
बस एक ही तो रंग है क़ुदरत का,
कभी नज़र आता है,
तो कभी-कभी दिखाई नहीं देता ।
और दूसरे रंग खो चुके हैं अब,
मेरा टॉमी भी यही कहता है,
उसे सब कुछ बस भूरा दिखाई देता है,
मुझको अफ़सोस है उसके लिए,
क्या वह और रंग नहीं देख पाता?
वह बस पहचानता है गंध से बस,
और हँसता है मुझ पर,
जब मुझे अच्छी-बुरी गंध की पहचान नहीं होती!
वह भौंकता रहता है मेरी गर्ल-फ़्रैंड पर,
और मैं उसे रोकता रहता हूँ!
तब वह मुझ पर भी भौंकने लगता है !
मेरी गर्ल-फ़्रैंड यूँ तो ख़ूबसूरत है,
इसलिए यही एक रंग मुझे,
उसमें दिखाई देता है,
और उसकी गंध भी है मादक,
फिर क्यों टॉमी को वह नहीं भाती?
मैं नहीं छोड़ सकता टॉमी को,
मैं नहीं छोड़ सकता गर्ल-फ़्रैंड को,
और दोनों ने मुझे छोड़ दिया है !
पर मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता कोई!
बस एक ही तो रंग है क़ुदरत का!
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और अफ़सोस यह भी,
कि मुझे जीवन और मृत्यु के रंग भी,
अलग-अलग नहीं दिखाई देते!
इसलिए भी शायद,
लोग मुझे पसंद नहीं करते !
क्योंकि मेरी नज़र में,
बस एक ही तो रंग है क़ुदरत का!
हाँ, मैं कलर-ब्लाइन्ड हो चला हूँ !
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