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Sunday, 14 January 2024

कल का सपना

कविता : 23 06 2023

कल का सपना कुछ अजीब था, 

न कोई दूर था, और न ही, क़रीब था!

एक माहौल वो, जिसमें कि मैं भी था,

मेरे जैसा ही उन सबका भी नसीब था।

वैसे हर कोई ही था ही बहुत दौलतमंद,

हर कोई ही, लेकिन बहुत गरीब था!

कोई नाकामयाब या फिर था कामयाब,

कोई शायर, कोई रिसाला-ए-अदीब था।

कोई नज़ूमी था तो और कोई था नद़ीम,

कोई किसी का दोस्त, कोई रक़ीब था।

सपना भी टूट गया, नींद भी टूट गई, 

टूट गया वो भी, जो वक्त का ज़रीब था!

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Thursday, 27 April 2023

षोडषाध्यायः

अष्टावक्र गीता

षोडषाध्यायः

श्लोक १

अष्टावक्र उवाच --

आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः।।

तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते।।१।।

(आचक्ष्व शृणु वा तात नाना शास्त्राणि अनेकशः। तथापि तव न स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद् ऋते।।)

अर्थ  : अष्टावक्र बोले --

हे तात, तुम अनेक शास्त्रों को अनेक प्रकार से कितना ही कहो या सुनो, तो भी जब तक उन सबको पूरी तरह से विस्मृत न कर दो, तब तक तुम्हारा चित्त स्वस्थ न हो सकेगा।

--

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಷೋಡಾಧ್ಯಾಯಃ

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಉವಾಚ --

ಆಚಕ್ಷ್ವ ಶೃಣು ವಾ ತಾತ ನಾನಾಶಾಸ್ತ್ರಾಣ್ಯನೇಕಶಃ||

ತಥಾಪಿ ನ ತವ ಸ್ವಾಸ್ಥ್ಯಂ ಸರ್ವವಿಸ್ಮರಣಾದೃತೇ||೧||

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Ashtavakra Gita

Chapter 16

Stanza 1

Ashtavakra said --

My Child, you may often speak upon various scriptures or hear them. But you cannot be established in the Self unless you forget all.

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Emptying the mind!  of all known!

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