Thursday, 6 April 2023

क्व धनानि क्व मित्राणि

अष्टावक्र गीता

अध्याय १४

श्लोक २

क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः।।

क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा।।२।।

(क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषय-दस्यवः। क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा।।)

अर्थ : अब, जब मेरी स्पृहा / कामना ही गलकर नष्ट हो चुकी है, तो इन धन-सम्पत्तियों, मित्रों, विभिन्न विषय-रूपी दस्युओं, और शास्त्रों एवं शास्त्रों के ज्ञान से भी, मुझे क्या प्रयोजन है!  

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೪

ಶ್ಲೋಕ ೨

ಕ್ವ ಧನಾನಿ ಕ್ವ ಮಿತ್ರಾಣಿ

ಕ್ವ ಮೇ ವಿಷಯಧಸ್ಯವಃ||

ಕ್ವ ಶಾಸ್ತ್ರಂ ಕ್ವ ಚ ವಿಜ್ಞಾನಂ

ಯದಾ ಮೇ ಗಲಿತಾ ಸ್ಪೃಹಾ||೩||

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Ashtavakra Gita

Chapter 14

Stanza 2

When my desire has melted away, where are my riches, where my friends and the robbers in the form of the sense-objects, and where are scripture and knowledge.

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चतुर्दशाध्याय

अष्टावक्र गीता

अध्याय १४

श्लोक १

जनक उवाच  --

प्रकृत्या शून्यचित्तोयः प्रमादाद्भाव भावनः।।

निद्रितो बोधित इव क्षीणसंसरिणो हि सः।।१।।

(प्रकृत्या शून्यचित्तः यः प्रमादात् भाव भावनः। निद्रितः बोधित इव क्षीणसंसरिणः हि सः।।)

अर्थ : वह जो स्वभाव से तो चित्त / चित्तवृत्ति से रहित है, प्रमाद (अनवधानता) के ही कारण कल्पनाएँ करता हुआ भावनाओं से युक्त प्रतीत होता है। जैसे कि सोए हुए मनुष्य से कुछ कहा जाने पर जैसे तैसे उसकी कोई प्रतिक्रिया होती है, इसी प्रकार उसका चित्त अत्यन्त दुर्बल होकर विषयों आदि में संचरित होता हुआ (मानो) भावों और भावकर्ता (विचार और विचारकर्ता) का रूप ग्रहण कर लेता है।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೪

ಶ್ಲೋಕ ೧

ಜನಕ ಉವಾಚ --

ಪ್ರಕೃತ್ಯಾ ಶೂನ್ಯಚಿತ್ತೋಯಃ ಪ್ರಮಾದಾತ್ಭಾವಭಾವನಃ||

ನಿದ್ರಿತೋ ಬೋಧಿತ ಇವ ಕ್ಷೀಣಸಂಸರಿಣೋ ಹಿ ಸಃ||೧||

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Ashtavakra Gita

Chapter 14

Stanza 1

Janaka said --

He has verily his worldly life exhausted, who has a mind emptied of (worldly) thoughts by nature spontaneously, who thinks of objects through inadvertence, and who is as it were awake though asleep.

(Effortless emptying of mind)

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Wednesday, 5 April 2023

सुखादिरूपानियमम्

अष्टावक्र गीता

अध्याय १३

श्लोक ७

सुखादिरूपानियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः।।

शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम्।।७।।

(सुख आदिरूपा नियमं भावेषु आलोक्य भूरिशः। शुभ-अशुभे विहायास्मात् अहं आसे यथासुखम्।।)

अर्थ : सुख-दुःख आदि भावनाएँ किस प्रकार सतत बदलती हैं, इसका पुनः पुनः अवलोकन करने के बाद मैंने शुभ और अशुभ दोनों को ही त्याग दिया और मैं सुखपूर्वक रहता हूँ।

||इति त्रयोदशाध्यायः||

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೩

ಶ್ಲೋಕ ೭

ಸುಖಾದಿರೂಪಾನಿಯಮಂ

ಭಾವೇಷ್ವಾಲೋಕ್ಯ ಭೂರಿಶಃ||

ಶುಭಾಶುವೇ ವಿಹಾಯಾಸ್ಮಾ-

ದಹಮಾಸೇ ಯಥಾಸುಖಮ್||೭||

||ಇತಿ ತ್ರಯೋದಶಾಧ್ಯಾಯಃ||

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Ashtavakra Gita

Chapter 13

Stanza 7

Observing again and again the fluctuations of pleasures, etc., under different conditions, I have renounced good and evil and am happy. 

Thus concludes chapter 13 of the text :

Ashtavakra Gita.

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स्वपतो नास्ति मे हानिः

अष्टावक्र गीता

अध्याय १३

श्लोक ६

स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा।।

नाशोल्लासौविहायास्मादहमासे यथासुखम्।।६।।

(स्वपतः न अस्ति मे हानिः सिद्धिः यत्नवतः न वा। नाश उल्लास विहायास्मात् अहं आसे यथासुखम्।।)

अर्थ  : न तो सुषुप्त होने से मुझे कोई हानि होती है, और न यत्न करने से कोई लाभ। इसलिए हानि-लाभ, के शोक या प्रसन्नता से रहित मैं नित्य और सदा ही सुखपूर्वक रहता हूँ।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೩

ಸ್ವಪತೋ ನಾಸ್ತಿ ಮೇ ಹಾನಿಃ

ಸಿದ್ಧಿರ್ಯತ್ನವತೋ ನ ವಾ||

ನಾಶೋಲ್ಲಾಹೌವಿಹಾಯಾಸ್ಮಾ-

ದಹಮಾಸೇ ಯಥಾಸುಖಮ||೬||

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Ashtavakra Gita

Chapter 13

Stanza 6

By going to sleep I have no loss whatsoever, nor gain whatsoever by making efforts and keeping awake. By giving up thought of loss or gain, I stay in peace and bliss all the time.

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Tuesday, 4 April 2023

अर्थानर्थौ न मे स्थित्वा

अष्टावक्र गीता

अध्याय१३

श्लोक ५

अर्थानर्थौ न मे स्थित्वा गत्या न शयनेन वा।।

तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् तस्मादहमासे यथासुखम्।।५।।

(अर्थ-अनर्थौ न मे स्थित्वा गत्या न शयनेन वा। तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् तस्मात् अहं आसे यथासुखम्।।)

अर्थ : कहीं भी होने, रहने, आने या जाने या निद्रा में सो जाने से मुझे कोई भी प्रयोजन, लाभ या हानि नहीं है। इसलिए कहीं भी होने, आने या जाने, सुषुप्ति (या जागृत अवस्था) में भी मैं सदैव सुख-पूर्वक होता हूँ।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೩

ಶ್ಲೋಕ ೫

ಅರ್ಥಾನರ್ಥೌ ನ ಮೇ ಸ್ಥಿತ್ವಾ

ಗತ್ಯಾ ನ ಶಯನೇನ ವಾ||

ತಿಷ್ಠನ್ ಗಚ್ಛನ್ ಸ್ವಪನ್ ತಸ್ಮಾ-

ದಹಮಾಸೇ ಯಥಾಸುಖಮ್||೫||

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Ashtavakra Gita

Chapter 13

Stanza 5

No good or evil accrues to me by staying, going or sleeping. So I live happily whether I stay, go or sleep.

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Monday, 3 April 2023

कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावादेह

अष्टावक्र गीता

अध्याय १३

श्लोक ४

कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावादेहस्थयोगिनः।।

संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम्।।४।।

(कर्म-नैष्कर्म्य-निर्बन्ध-भावात् इहस्थ योगिनः। संयोग-अयोग विरहात् अहं आसे यथासुखम्।।)

अर्थ : देहात्मभावना से युक्त होने पर योगी कर्म तथा नैष्कर्म्य आदि के विचार से बद्ध होते हैं । जबकि देह से अपनी बद्धता या भिन्नता अर्थात् संयोग या वियोग की भावना से रहित होने से, मैं नित्य स्वतन्त्र होकर सुखपूर्वक रहता हूँ।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೩

ಶ್ಲೋಕ ೪

ಕರ್ಮನೈಷ್ಕರ್ಮ್ಯ ನಿರ್ಭಾಬನ್ಧ-

ಭಾವಾದೇಹಸ್ಥ ಯೋಗಿನಃ||

ಸಂಯೋಗಾಯೋಗ ವಿರಹಾ-

ದಹಮಾಸೇ ಯಥಾಸುಖಮ್||೪||

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Ashtavakra Gita

Chapter 13

Stanza 4

The yogis who are attached to the body insist upon action or inaction. Owing to the absence of association and dissociation, I live happily.

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Saturday, 1 April 2023

कृतं किमपि नैव स्यात्

अष्टावक्र गीता

अध्याय १३

श्लोक ३

कृतं किमपि नैव स्यादिति सञ्चिन्त्य तत्त्वतः।।

यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे यथासुखम्।।३।।

(कृतं किं अपि न एव स्यात् इति सञ्चिन्त्य तत्त्वतः। यदा यत् कर्तुं आयाति तत् कृत्वा आसे यथासुखम्।।)

अर्थ : वस्तुतः तो कर्ममात्र घटित भर होता है, न तो किसी के द्वारा किया जाता है, न कर्म का कोई अपना स्वतंत्र अस्तित्व है, कर्म, असंख्य क्रियाओं का केवल सम्मिलित एक परिणाम मात्र होता है, इस प्रकार से कर्म के स्वरूप को तत्त्वतः समझते हुए जब जो कर्म कर्तव्य की भाँति प्राप्त होता है, मैं उसे करता हुआ सुखपूर्वक रहता हूँ।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೩

ಶ್ಲೋಕ ೩

ಕೃತಂ ಕಿಮಪಿ ನೈವಸ್ಯಾ-

ದಿತಿ ಸಞ್ಚಿನ್ಚ್ಯ ತತ್ತ್ವತಃ||

ಯದಾ ಯತ್ಕರ್ತುಮಾಯಾತಿ

ತತ್ ಕೃತ್ಮಾಸೇ ಯಥಾಸುಖಂ||೩||

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Ashtavakra Gita

Chapter 13

Stanza 3 

Fully realizing that nothing whatsoever is really done by the Self, I do whatever presents itself to be done and live happily.

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