Friday, 17 March 2023

नानाश्चर्यमिदं विश्वं

अष्टावक्र गीता

अध्याय ११

श्लोक ८

नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी।।

निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिवशाम्यति।।८।।

(नाना आश्चर्यं इदं विश्वं न किञ्चित् इति निश्चयी। निर्वासनः स्फूर्तिमात्रः न किञ्चित् इव शाम्यति।।)

अर्थ : जिसे इसका निश्चय हो जाता है कि नाना आश्चर्यों से भरा यह विश्व वस्तुतः है ही नहीं, वह इच्छारहित होकर स्फूर्ति (भान) मात्र होता है और इतना और परिपूर्णतः शान्त हो जाता है जैसे कि कहीं कुछ हो ही नहीं।

।।इति एकादशोध्यायः।। 

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೧

ಶ್ಲೋಕ ೮

ನಾನಾಶ್ಚರ್ಯಮಿದಂ ವಿಶ್ವಂ ನ ಕಿಞ್ಚಿದಿತಿ ನಿಶ್ಚಯೀ||

ನಿರ್ವಾಸನಃ ಸ್ಫುರ್ತಿಮಾತ್ರೋ ನ ಕಿಞ್ಚಿದಿವ ಶಾಮ್ಯತಿ||೮||

||ಇತಿ ಏಕಾದಶೋಧ್ಯಾಯಃ||

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Ashtavakra Gita

Chapter 11

Stanza 8

One who knows for certain that this manifold and wonderful universe is nothing, becomes desireless and pure Intelligence, and finds peace as if nothing exists.

Thus concludes Chapter 11 of the text :

Ashtavakra Gita.

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Wednesday, 15 March 2023

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं

अष्टावक्र गीता

अध्याय ११

श्लोक ७

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं अहमेवेति निश्चयी।।

निर्विकल्पः शुचि शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः।।७।।

(आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं अहं एव इति निश्चयी। निर्विकल्पः शुचि शान्तः प्राप्त अप्राप्त विनिर्वृतः।।)

अर्थ : तृण से ब्रह्म (या ब्रह्मा) तक सब अहं अर्थात् एकमेव और अद्वितीय आत्मा ही है, इस प्रकार का निश्चय जिसे होता है, वह अन्य कुछ नहीं, शुद्ध और शान्त होता है तथा प्राप्त और अप्राप्त पर उसका ध्यान ही नहीं होता।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೧

ಶ್ಲೋಕ ೬

ಆಬ್ರಹ್ಮಸ್ತಮ್ಬಪರ್ಯನ್ತಂ ಅಹಮೇವೇತಿ ನಿಶ್ಚಯೀ||

ನಿರ್ವಿಕಲ್ಪಃ ಶುಚಿಃ ಶಾನ್ತಃ ಪ್ರಾಪ್ತಾಪ್ರಾಪ್ತವಿನಿರ್ವತಃ ||೬||

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Ashtavakra Gita

Chapter 11

Stanza 7

"It is verily I from Brahma down to the clump of grass,"---one who knows this for certain, becomes free from the condlict of thought, pure and peaceful, and turns away from what is attained or not attained.

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Monday, 13 March 2023

नाहं देहो न मे देहो

अष्टावक्र गीता

अध्याय ११

श्लोक ६

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति* निश्चयी।।

कैवल्यमिव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्।।६।।

(न अहं देहः न मे देहः बोधः अहं इति निश्चयी। कैवल्यंं इव संप्राप्तः न स्मरति अकृतं कृतम्।। *पाठान्तर : बोधोहमिति, बोधोऽहमिति, - दोनों प्रकार से स्वीकार्य है जैसे कठोपनिषद् में "गूढोत्मा" शब्द का प्रयोग जो व्याकरणसम्मत भी है और ऋषि-सम्मत भी है।)

अर्थ : "न मैं शरीर हूँ, और न ही शरीर मेरा है, मैं बोध हूँ", यह निश्चय जिसे हो जाता है, वह कैवल्य को प्राप्त हो जाता है, और उसे "मैंने क्या किया और क्या नहीं किया", यह भी स्मरण नहीं रह जाता है ।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೧

ಶ್ಲೋಕ ೬

ನಾಹಂ ದೇಹೋ ನ ಮೇ ದೇಹೋ

ಬೋಧೋಹಮಿತಿ ನಿಶ್ಚಯೀ ||

ಕೈವಲ್ಯಮಿವ ಸಂಪ್ರಾಪ್ತೋ

ನ ಸ್ಮರತ್ಯಕೃತಂಕೃತಮ್||೬||

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Ashtavakra Gita

Chapter 11

Stanza 6

"I am not the body,  Nor is the body mine, I am Intelligence itself ". One who has realized this for certain, does not remember what he has done or not done, as if he has attained the state of absoluteness.

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चिन्तया जायते दुःखं

अष्टावक्र गीता

अध्याय ११

श्लोक ५

चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी।।

तयाहीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गळितस्पृहः।।५।।

(चिन्तया जायते दुःखं न अन्यथा इह इति निश्चयी। तथा हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गळितस्पृहः।।)

अर्थ : जिसे यह निश्चय हो जाता है कि चिन्ता से ही दुःख उत्पन्न होता है, वह सर्वत्र स्पृहा से रहित, सुखी और शान्त हो जाता है।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೧

ಶ್ಲೋಕ ೫

ಚಿನ್ತಯಾ ಜಾಯತೇ ದುಃಖಂ ನಾನ್ಯಥೇಹೇತಿ ನಿಶ್ಚಯೀ||

ತಯಾ ಹೀನಃ ಸೀಖೀ ಶಾನ್ತಃ ಸರ್ವತ್ರ ಗಳಿತಸ್ಪೃಹಃ||೫||

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Ashtavakra Gita

Chapter 11

Stanza 5

One who has realized that care in this world, breeds misery and nothing else, becomes free from it, and is happy, peaceful and rid of desires everywhere.

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Saturday, 11 March 2023

सुख-दुःखे जन्ममृत्यू

अष्टावक्र गीता

अध्याय ११

श्लोक ४

सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी।।

साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते।।४।।

(सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवात् एव इति निश्चयी। साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन् अपि न लिप्यते।।)

अर्थ : सुख और दुःख, जन्म और मृत्यु दैव से ही घटित होते हैं इस प्रकार के आदर्श निश्चय से युक्त मनुष्य अपने सभी कर्मों को उनसे अलिप्त रहते हुए, प्रयास न करते हुए ही कर लेता है।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೧

ಶ್ಲೋಕ ೪

ಸುಖಜುಃಖೇ ಜನ್ಮಮೃತ್ಯೂ ದೈವಾದೇವೇತಿ ನಿಶ್ಚಯೀ||

ಸಾಧ್ಯಾದರ್ಶೀ ನಿರಾಯಾಸಃ ಕೀರ್ವನ್ನಪಿ ನ ಲಿಪ್ಯತೇ ||೪||

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Ashtavakra Gita

Chapter 11

Stanza 4

Knowing for certain that happiness and misery, birth and death are due to one's fate, one comes to see that it is not possible to accomplish the desired things and thus becomes in-active and is not attached even though engaged in actions. 

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Thursday, 9 March 2023

आपदः संपदः काले

अष्टावक्र गीता

अध्याय ११

श्लोक ३

आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी।।

तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वाञ्छति न शोचति।।३।।

(आपदः संपदः काले दैवात् एव निश्चयी। तृप्तः स्वस्थ-इन्द्रियः नित्यं न वाञ्छति न शोचति।।)

अर्थ : जिसे यह निश्चय हो जाता है कि समृद्धि, सम्पत्ति और विपत्ति समय समय पर दैव से ही प्राप्त हुआ करती है वह नित्य ही स्वस्थचित्त होता है, उसे न तो कोई कामना होती है, न कोई चिन्ता।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೧

ಶ್ಲೋಕ ೩

ಆಪದಃ ಸಂಪದಃ ಕಾಲೇ ದೈವಾದೇವೇತಿ ನಿಶ್ಚಯೀ||

ತೃಪ್ತಃ ಸ್ವಸ್ಥೇನ್ದ್ರಿಯೋ ನಿತ್ಯಂ ನ ವಾಞ್ಛತಿ ನ ಶೋಚತಿ||೩||

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Ashtavakra Gita

Chapter 11

Stanza 3

Knowing for certain that adversity and prosperity come in (their own) time through fate, one is ever contented, has all his senses in control and does not desire or grieve.

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ईश्वरः सर्वनिर्माता

अष्टावक्र गीता

अध्याय ११

श्लोक २

ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी।।

अन्तर्गळितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते।।२।।

(ईश्वरः सर्वनिर्माता न इह अन्यः इति निश्चयी। अन्तर्गळित-सर्वाशः शान्तः क्व-अपि न सज्जते।।)

अर्थ : एकमेव ईश्वर ही सब का निर्माण करनेवाला है दूसरा और कोई नहीं है जो इसे निश्चयपूर्वक जान लेता है, उसके हृदय की समस्त इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं। इस प्रकार से अपनी समस्त आशाएँ त्यागकर शान्तचित्त हुए मनुष्य की किसी के भी प्रति कोई आसक्ति शेष नहीं रह जाती। 

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೧

ಶ್ಲೋಕ ೨

ಈಶ್ವರಃ ಸರ್ವನಿರ್ಮಾತಾ ನೇಹಾನ್ಯ ಇತಿ ನಿಶ್ಚಿಯೀ||

ಅನ್ತರ್ಗಳಿತಸರ್ವಾಶಃ ಶಾನ್ತಃ ಕ್ವಾಪಿ ನ ಸಜ್ಜತೇ ||೨||

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Ashtavakra Gita

Chapter 11

Stanza 2

Knowing for certain that Ishvara is the creator of All and that there is no other here, one becomes peaceful with all his desires set at rest within and is not attached to anything whatsoever.

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