Saturday, 7 January 2023

यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः

अष्टावक्र गीता

अध्याय ४

श्लोक २

यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवता।।

अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति।।२।।

(यत् पदं प्रेप्सवः दीनाः शक्र आद्याः सर्वदेवता। अहो तत्र स्थितः योगी न हर्षं उपगच्छति।।)

अर्थ : उस (परम) पद को प्राप्त करने के लिए, जिसे प्राप्त करने के लिए इन्द्र इत्यादि सारे देवता भी लालायित होते हैं, और उसे प्राप्त न कर पाने से दुःखी अनुभव करते हैं, वहाँ पर अनायास ही स्थित हुआ योगी सुख या दुःख आदि से उदासीन रहते हुए, किसी हर्ष आदि से भी रहित होता है।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ 

ಅಧ್ಯಾಯ ೪

ಶ್ಲೋಕ ೨

ಯತ್ಪದಂಪ್ರೇಪ್ಸವೋ ದಿನಾಃ

ಶಕ್ರಾದ್ಯಾಃ ಸರ್ವದೇವತಾಃ||

ಅಹೋ ತತ್ರ ಸ್ಥಿತೋ ಯೋಗೀ

ನ ಹರ್ಷಮುಪಗಚ್ಛತಿ ||೨||

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Oh, the Yogi does not feel elated abiding in that position which Indra and all other gods hanker after and become unhappy.

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Friday, 6 January 2023

हन्तात्मज्ञस्य धीरस्य

अष्टावक्र गीता

अध्याय ४

श्लोक १

अष्टावक्र उवाच --

हन्तात्मज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।।

न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता।।१।।

(हन्त आत्मज्ञस्य धीरस्य खेलतः भोगलीलया। न हि संसारवाहीकैः मूढैः सह समानता।।)

अर्थ : अष्टावक्र ने कहा :

अब, उस आत्मज्ञ धीर के आचरण के बारे में, जो कि अनायास भोगों, लीलाओं आदि में रमता प्रतीत होता है। किसी दूसरे और सांसारिक मूढ से उसकी कोई समानता कदापि नहीं हो सकती।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೪

ಶ್ಲೋಕ ೧

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಉವಾಚ :

ಹನ್ತಾತ್ಮಜ್ಞಸ್ಯ ಧೀರಸ್ಯ ಖೇಲತೋ ಭೋಗಲೀಲಯಾ||

ನ ಹಿ ಸಂಸಾರವಾಹೀಕೈರ್ಮೂಢೈಃ ಸಹಸಮಾನತಾ||೧||

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Ashtavakra Gita

Chapter 4

Stanza 1

Ashtavakra said :

Oh! The intelligent minded one, -the knower of Self plays the game of enjoyment, has no similarity to the deluded beasts of the world.

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Thursday, 5 January 2023

अन्तस्त्यक्तकषायस्य

अष्टावक्र गीता

अध्याय ३

श्लोक १४

अन्तस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः।।

यदृच्छया गतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये।।१४।।

।।इति तृतीयोऽध्यायः।।

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(अन्तस् त्यक्त कषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः। यदृच्छया गतः भोगः न दुःखाय न तुष्टये।। निराशिन् - निराशिष् - निराशिषः - त्यक्ता-आशा यस्य)

अर्थ : जिसने अन्तःकरण के कषायों को त्याग दिया है, समस्त द्वन्द्वों से जो ऊपर उठ चुका है, नियति / अज्ञात प्रारब्ध से प्राप्त होनेवाले भोगों से वह न तो दुःखी होता है, और न ही प्रसन्न या असन्तुष्ट होता है।

अष्टावक्र गीता का तृतीय अध्याय पूर्ण ।। 

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೩

ಶ್ಲೋಕ ೧೪

ಅನ್ತಸ್ತ್ಯಕಷಾಯಸ್ಯ

ನಿರ್ದ್ವನ್ದಸ್ಯ ನಿರಾಶಿಷಃ||

ಯದೃಚ್ಛಯಾ ಗತೋ ಭೋಗೋ

ನ ದುಃಖಾಯ ನ ತುಷ್ಟಯೇ||೧೪||

||ಇತಿ ತೃತೀಯೋಧ್ಯಾಯಃ||

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Ashtavakra Gita

Chapter 3

Stanza 14

He, who has given up worldly attachment in his mind, who is beyond the pairs of opposites, and who is free from desire, any experience coming as a matter of course owing to fate, does not cause either pleasure or pain to him. 

Thus concludes the chapter 3 of the Ashtavakra Gita.

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Wednesday, 4 January 2023

स्वभावादेव जानानो

अष्टावक्र गीता

अध्याय ३

श्लोक १३

स्वभावादेव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन।।

इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः।।१३।।

(स्वभावात् एव जानानः दृश्यं एतत् न किञ्चन। इदं ग्राह्यं इदं त्याज्यं सः किं पश्यति धीरधीः।।)

अर्थ : जो यह जानते हैं कि यह समस्त दृश्यमात्र (प्रपञ्च) ही मिथ्या आभास है, वस्तुतः अस्तित्वशून्य है, ऐसे स्थिरबुद्धि और विवेकी मनुष्य में "यह ग्राह्य है और यह त्याज्य है।" इस प्रकार की दृष्टि होती ही नहीं, अतः उसके लिए यह प्रश्न भी नहीं होता।

(सन्दर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता 5/14, 10/8)

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೩

ಶ್ಲೋಕ ೧೩

ಸ್ವಭಾವಾದೇವ ಜಾನಾನೋ

ದೃಶ್ಯಮೇತನ್ನ ಕಿಞ್ಚನ||

ಇದಂ ಗ್ರಾಹ್ಯಮಿದಂ ತ್ಯಾಜ್ಯಂ

ಸ ಕಿಂ ಪಶ್ಯತಿ ಧೀರಧೀಃ||೧೩||

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Ashtavakra Gita

Chapter 3

Stanza 13

Why should that steady-minded one, - who knows the Object to be in its very nature nothing, consider this fit to be accepted and that to be rejected. 

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Tuesday, 3 January 2023

निस्पृहं मानसं यस्य

अष्टावक्र गीता

अध्याय ३

श्लोक १२

निस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः।।

तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते।।१२।।

(निस्पृहं मानसं यस्य नैराश्ये अपि महात्मनः। तस्य-आत्मज्ञान-तृप्तस्य तुलना केन जायते।।)

अर्थ  : वह आत्मज्ञानी महात्मा जिसका मन निराशा की स्थिति को भी कामनारहित रहते हुए सहजता से स्वीकार कर लेता है, ऐसे किसी आत्मज्ञान से तृप्त मनुष्य की तुलना क्या किसी और के साथ की जा सकती है!

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ 

ಅಧ್ಯಾಯ ೩

ಶ್ಲೋಕ ೧೨

ನಿಸ್ಪೃಹಂ ಮಾನಸಂ ಯಸ್ಯ ನೈರಾಶ್ಯೇऽಪಿ ಮಹಾತ್ಮನಃ||

ತಸ್ಯಾತ್ಮಜ್ಞಾನತ್ಮಪ್ತಸ್ಯ ತುಲನಾ ಕೇನಜಾಯತೇ||೧೨||

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Ashtavakra Gita

Chapter 3

Stanza 12

With whom can we compare, that, -- such a great-souled one, contented with the knowledge of Self, -- who is desireless even in disappointment.

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Monday, 2 January 2023

मायामात्रमिदंविश्वं

अष्टावक्र गीता

अध्याय ३

श्लोक ११

मायामात्रमिदंविश्वं पश्यन् विगतकौतुकः।

अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः।।११।।

(माया-मात्रं इदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः। अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः।।)

अर्थ : इस समस्त दृश्यजगत् को केवल माया ही समझकर उसी दृष्टि से देखते हुए, धीर पुरुष कदापि विस्मित नहीं होता, यहाँ तक कि मृत्यु सन्निकट होने पर भी वह उससे त्रस्त नहीं होता।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೩

ಶ್ಲೋಕ ೧೧

ಮಾಯಾಮಾತ್ರಮಿದಂ ವಿಶ್ವಂ ಪಶ್ಯನ್ ವಿಗತಕೈತುಕಃ||

ಅತಿ ಸನ್ನಿಹಿತೀ ಮೃತ್ಯೌ ಕಥಂ ತ್ರಸ್ಯತಿ ಧೀರಧೀಃ||೧೧||

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Ashtavakra Gita

Chapter 3

Stanza 11

Viewing this universe as mere illusion and losing all interest therein, how can one of steady mind fear even the approach of death!

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Sunday, 1 January 2023

चेष्टमानं शरीरं स्वं

अष्टावक्र गीता

अध्याय ३

श्लोक १०

चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत्।।

संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः।।१०।।

(चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यति अन्य शरीरवत्। संस्तवे च अपि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः।।)

अर्थ : (अपनी दिव्य आत्मा के तत्व और तात्पर्य अर्थात्) महान आशय को जाननेवाला मनुष्य विभिन्न चेष्टाएँ करनेवाले अपने इस शरीर को भी दूसरे सभी अन्य शरीरों की तरह ही देखता है। (इसलिए) किसी के द्वारा अपनी स्तुति या निन्दा किए जाने पर उसे क्षोभ कैसे हो सकता है!

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ಚೇಷ್ಟಮಾನಂ ಶರೀರಂ ಸ್ವಂ

ಪಶ್ಯತ್ಯನ್ಯ-ಶರೀರವತ್ ||

ಸಂಸ್ತವೇ ಚಾಪಿ ನಿನ್ದಾಯಾಂ

ಕಥಂ ಕ್ಷುಭ್ಯೇತ್ ಮಹಾಶಯಃ ||೧೦||

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Ashtavakra Gita

Chapter 3

Stanza 10

The high-souled person witnesses his own body acting as if it were another's. As such, how can he be disturbed by praise or blame!

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