Wednesday, 8 March 2023

एकादशोऽध्यायः

अष्टावक्र गीता

अध्याय ११

श्लोक १

भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी।।

निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति।।१।।

(भाव-अभाव-विकारः च स्वभावात् इति निश्चयी। निर्विकारो गतक्लेशः सुखेन एव उपशाम्यति।।)

अर्थ : जिसे यह निश्चय हो जाता है कि भाव तथा विलय के रूप में होते रहनेवाला परिवर्तन स्वभाव की ही अभिव्यक्ति है, उसके क्लेश सुखपूर्वक शान्त हो जाते हैंं और वह शान्ति में स्थित हो जाता है। 

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ८,

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।।

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಏಕಾದಶೋಧ್ಯಾಯಃ

ಶ್ಲೋಕ ೧

ಭಾವಾಭಾವವಿಕಾರಶ್ಚ ಸ್ವಭಾವಾಜಿತಿ ನಿಶ್ಚಯೀ||

ನಿರ್ವಿಕಾರೋ ಗತ್ಲೇಶಃ ಸುಖೇನೈವೋಫಶಾಮ್ಯತಿ||೧||

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Ashtavakra Gita

Chapter 11

Stanza 1

One who has realized that existence, non-existence and change are in the nature of things, easily finds repose, being unperturbed and free from pain.

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Monday, 6 March 2023

कृतं न कति जन्मानि

अष्टावक्र गीता

अध्याय १०

श्लोक ८

कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।।

दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम्।।८।।

(कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा। दुःखं आयासदं कर्म तत् अद्य अपि उपरम्यताम्।।)

अर्थ : कितने ही जन्मों से अब तक भी क्या तुम शरीर, मन और वाणी से बहुत कष्ट के साथ, कठोर-श्रम और प्रयास से अनेक कर्म नहीं करते आ रहे हो। आज तो उन्हें करते रहना छोड़ दो!

||इति दशमोध्यायः||

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೦

ಶ್ಲೋಕ ೮

ಕೃತಂ ನ ಕತಿ ಜನ್ಮಾನಾ

ಕಾಯೇನ ಮನಸಾ ಗಿರಾ||

ದುಃಖಮಾಯಾಸದಂ ಕರ್ಮ

ತದದ್ಯಾಪ್ಯುಪರಮ್ಯತಾಂ||೮||

||ಇತಿ ದಶಮೋಧ್ಯಾಯಃ||

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Ashtavakra Gita

Chapter 10

Stanza 8

For how many incarnations have you not done hard and painful work with your body, mind and speech! Therefore cease at least today.

Thus concludes chapter 10 of the text :

Ashtavakra Gita. 

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अलमर्थेन कामेन

अष्टावक्र गीता

अध्याय १०

श्लोक ७

अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा।।

एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः।।७।।

(अलं अर्थेन कामेन सुकृतेन अपि कर्मणा। एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तं अभूत् मनः।।)

अर्थ : सांसारिक प्रयोजनों, कामनाओं और पुण्यकर्मों को भी अब त्याग ही दो। संसार रूपी भयावह अरण्य में इससे मन की विश्रान्ति कभी नहीं हो सकती।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೦

ಶ್ಲೋಕ ೭

ಅಲಮರ್ಥೇನ ಕಾಮೇನ ಸುಕೃತೇನಾಪಿ ಕರ್ಮಣಾ||

ಏಭ್ಯಃ ಸಂಸಾರಕಾಂತಾರೇ ನ ವಿಶ್ರಾನ್ತಮಭೂನ್ಮನಃ||೭||

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Ashtavakra Gita

Chapter 10

Stanza 7

Enough of prosperity, desire and pious deed. The mind did not find repose in the dreary forest of the world.

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Saturday, 4 March 2023

राज्यं सुताः कळत्राणि

अष्टावक्र गीता

अध्याय १०

श्लोक ५

राज्यं सुताः कळत्राणि शरीराणि सुखानि च।।

संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि ।।५।।

(राज्यं सुताः कळत्राणि शरीराणि सुखानि च। संसक्तस्य अपि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि।।)

अर्थ : वे राज्य, पुत्र पौत्र और परिवार, शरीर और सुख जिनमें तुम जन्मों जन्मों तक यद्यपि संसक्त थे, सभी नष्ट हो गए।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೦

ಶ್ಲೋಕ ೫

ರಾಜ್ಯಂ ಸುತಾಃ ಕಳತ್ರಾಣಿ ಶರೀರಿಣಿ ಸುಖಾನಿ ಚ||

ಸಂಸಕ್ತಸ್ಯಾಪಿ ನಷ್ಣಾನಿ ತವ ಜನ್ಮನಿ ಜನ್ಮನಿ||೫||

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Ashtavakra Gita

Chapter 10

Stanza 5

Kingdoms, sons, wives, bodies and pleasures have been lost to you birth after birth, even though you were attached (to them).

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Friday, 3 March 2023

त्वमेकश्चेतनः

अष्टावक्र गीता

अध्याय १०

श्लोक ५

त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा।।

अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते।।५।।

(त्वं एकः चेतनः शुद्धः जडं विश्वं असत् तथा। अविद्या अपि न किञ्चित् सा का बुभुत्सा तथापि ते।।)

अर्थ : तुम एकमेव (सत्-अद्वितीय) अतः शुद्ध हो, जबकि विश्व जड और असत् है। (जिसे अविद्या कहा जाता है), अविद्या भी इसी प्रकार असत् है अर्थात् केवल विकल्प / शब्द है। फिर ऐसा क्या रह जाता है, जिसे तुम जानने के लिए तुम उत्सुक हो?

(शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः।।९।। समाधिपाद)

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೦

ಶ್ಲೋಕ ೫

ತ್ವಮೆಕಶ್ಚೇತನಃ ಶುದ್ಧೋ ಜಠಂ ವಿಶ್ವಮಸತ್ತಥಾ||

ಅವಿದ್ಯಾಪಿ ನ ಕಿಂಚಿತ್ಸಾ ಕಾ ಬುಭುತ್ಸಾ ತಥಾಪಿ ತೇ||೫||

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Ashtavakra Gita

Chapter 10

Stanza 5

You are One, Intelligent / Intelligence and pure. The universe is non-intelligent and non-existent. Ignorance too has no essence or substance. Yet what desire to know there can be for you!

(Ignorance is but an empty, sense-less word.)

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तृष्णा मात्रात्मको बन्धः

अष्टावक्र गीता

अध्याय १०

श्लोक ४

तृष्णा मात्रात्मको बन्धः तन्नाशो मोक्ष उच्यते।।

भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः।।४।।

(तृष्णा मात्रात्मकः बन्धः तत् नाशः मोक्षः उच्यते।

भव-असंसक्ति मात्रेण प्राप्ति-तुष्टिः मुहुः मुहुः।।)

अर्थ : कामना / तृष्णा ही एकमात्र बन्धन है, और उसके नाश को ही मोक्ष कहा जाता है। संसार, तृष्णा से पुनः पुनः उत्पन्न होती रहनेवाली आसक्ति (और आसक्ति से उत्पन्न तृष्णा) है। और संसार से आसक्ति का नाश ही नित्य विद्यमान प्राप्तिरूपी स्थायी (आत्मज्ञानरूपी) तुष्टि है। 

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೦

ಶ್ಲೋಕ ೪

ತೃಷ್ಣಾ ಮಾತ್ರಾತ್ಮಕೋ ಬನ್ಧಃ

ತನ್ನಾಶೋ ಮೋಕ್ಷ ಉಚ್ಯತೇ||

ಭವಾಸಂಸಕ್ತಿ ಮಾತ್ರೆಣ

ಫ್ರಾಪ್ತಿತುಷ್ಟಿರ್ಮುಹುರ್ಮುಹುಃ||೪||

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Ashtavakra Gita

Chapter 10

Stanza 4

Bondage consists only in desire and its destruction is called liberation. By non-attachment to the word alone, is attained constant joy from the realization (of the Self).

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Wednesday, 1 March 2023

यत्र यत्र भवेत् तृष्णा

अष्टावक्र गीता

अध्याय १०

श्लोक ३

यत्र यत्र भवेत् तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै।। 

प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव।।३।।

(यत्र यत्र भवेत् तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै। प्रौढवैराग्यं आश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव।।)

अर्थ : यह जान लो कि जहाँ जहाँ भी तृष्णा है, वहाँ अवश्य ही संसार ही है। अतः दृढ और परिपक्व वैराग्य का आश्रय लेकर तृष्णा से ऊपर उठो और सुखी हो रहो।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೦

ಶ್ಲೋಕ ೩

ಯತ್ರ ಯತ್ರ ಭವೇತ್ ತೃಷ್ಣಾ ಸಂಸಾರಂ ವಿದ್ಧಿ ತತ್ರ ವೈ||

ಪ್ರೌಢವೃರಾಗ್ಯಮಾಶ್ರಿತ್ಯ ವೀತತೃಷ್ಣಃ ಸುಖೀ ಭವ ||೩||

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Ashtavakra Gita

Chapter 10

Stanza 3

Know the world (samsara) to be indeed wherever there is desire. Betake yourself to firm Non-attachment, being freed from desire be happy.

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