Thursday, 13 April 2023

रागद्वेषौ मनो धर्मौ

अष्टावक्र गीता

अध्याय १५

श्लोक ५

रागद्वेषौ मनो धर्मौ न मनस्ते कदाचन।।

निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर।।५।।

(रागद्वेषौ मनः धर्मौ न मनः ते कदाचन। निर्विकल्पः असि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर।।)

अर्थ : राग और द्वेष मन के धर्म हैं, मन कदापि तुम्हारा नहीं।तुम निर्विकल्प बोधमात्र चिन्मात्र ओर निर्विकार आत्मा हो, सदा ही  इस प्रकार से सुखपूर्वक रहो।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೫

ರಾಗದ್ವೇಷೌ ಮನೋ ಧರ್ಮೋ

ನ ಮನಸ್ತೇ ಕದಾಚನ ||

ನಿರ್ಷಿಕಲ್ಪೋऽಸಿ ಬೋಧಾತ್ಮಾ

ನಿರ್ಷಿಕಾರಃ ಸುಖಂ ಚರ||೫||

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Ashtavakra Gita

Chapter 15

Stanza 5

Attachment and abhorrence are attributes of the mind. The mind is never yours. You are free from conflict, Intelligence itself and changeless. Get along happily.

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Wednesday, 12 April 2023

न त्वं देहो न ते देहो

अष्टावक्र गीता

अध्याय १५

श्लोक ४

न त्वं देहो न ते देहो भोक्ताकर्ता न वा भवान्।।

चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर।।४।।

(न त्वं देहः न ते देहः भोक्ता-कर्ता न वा भवान्। चित् रूपः असि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर।।)

अर्थ : न तो तुम शरीर हो और न शरीर तुम्हारा है। और न ही तुम कर्ता-भोक्ता आदि हो, तुम तो केवल शुद्ध चित्-रूप, नित्य साक्षी निरपेक्ष हो, और इसे जानते हुए सदा ही सुखपूर्वक रहो।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೫

ಶ್ಲೋಕ ೪

ನ ತ್ವಂ ದೇಹೋ ನ ತೇ ದೇಹೋ

ಭೋಕ್ತಾಕರ್ತಾ ನ ವಾ ಭವಾನ್||

ಚಿದ್ರೂಪೋऽಸಿ ಸದಾಸಾಕ್ಷೀ

ನಿರಪೇಕ್ಷಃ ಸುಖಂ ಚರ||೪||

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Ashtavakra Gita

Chapter 15

Stanza 4

You are not the body, nor is the body yours, nor or you the doctor the enjoyer. You are Intelligence itself, the eternal witness and you are free, Get along happily.

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वाग्मिप्राज्ञमहोद्योगं

अष्टावक्र गीता

अध्याय १५

श्लोक ३

वाग्मिप्राज्ञमहोद्योगं जनं मूकजडालसम्।।

करोति तत्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षुभिः।।३।।

(वाग्मि-प्राज्ञ-महोद्योगं जनं मूक-जड-आलसम्। करोति तत्त्वबोधः अयं अतः त्यक्तः बुभुक्षुभिः।।)

अर्थ : तत्त्व का यह बोध किसी वाक्चतुर को भी मूक, ज्ञानी को मूढ और उद्योगशील को आलसी बना देता है इसलिए सांसारिक सुखों की लालसा रखनेवाले अभिलाषी इसे त्याग देते हैं।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೫

ಶ್ಲೋಕ ೩

ವಾಗ್ಮಿಪ್ರಾಜ್ಞಮಹೋದ್ಯೋಗಂ

ಜನಂ ಮೂಕಜಡಾಲಸಮ್||

ಕರೋತಿ ತತ್ತ್ವಬೋಧೋऽಯ-

ಮತಸ್ತ್ಯಕ್ತೋ ಬುಭುಕ್ಷುಭಿಃ||೩||

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Ashtavakra Gita

Chapter 15

Stanza 3

This knowledge of truth makes an eloquent, wise and active person mute, inert lazy and inactive. Hence it is shunned by those who want to enjoy the world.

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Monday, 10 April 2023

मोक्षो विषयवैरस्यं

अष्टावक्र गीता

अध्याय १५

श्लोक २

मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिकोरसः।।

एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु।।२।।

(मोक्षः विषय-वैरस्यं बन्धः वैषयिकः रसः। एतावत् एव विज्ञानं यथा-इच्छसि तथा कुरु।।)

अर्थ : विषयों के प्रति अरुचि होना ही मोक्ष है, विषयों के प्रति रुचि होना बन्धन। (अध्यात्म के तत्व का) संपूर्ण विज्ञान मात्र यहीं तक, इतना ही है, अब आगे जैसी भी तुम्हारी इच्छा।

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १८ का निम्नलिखित श्लोक कुछ इसी तरह का प्रतीत होता है --

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।।

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।६३।।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೫

ಶ್ಲೋಕ ೨

ಮೋಕ್ಷೋ ವಿಷಯಷೈರಸ್ಯಂ

ಬಂಧೋ ಪೈಯಯಿಕೋ ರಸಃ||

ಏತಾವದೇವ ವಿಜ್ಞಾನಂ

ಯಥೇಚ್ಛಸಿ ತಥಾ ಕುರು||೨||

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Ashtavakra Gita

Chapter 15

Stanza 2

Distaste for sense-objects is liberation ; live for sense-objects is bondage. Such verily is Knowledge. Now do as you please.

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Sunday, 9 April 2023

यथातथोपदेशेन

अष्टावक्र गीता

अध्याय १५

श्लोक १

अष्टावक्र उवाच --

यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान्।।

आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति।।१।।

(यथा-तथा-उपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान्। आजीवं अपि जिज्ञासुः परः तत्र विमुह्यति।।)

अर्थ : किसी शुद्धबुद्धियुक्त मनुष्य के लिए जैसा भी उपदेश उसे दिया जाता है, उसे विवेक सहित ग्रहण कर वह कृतार्थ / धन्य हो जाता है, जबकि दूसरा कोई मनुष्य जिसकी बुद्धि शुद्ध नहीं हुई है, जीवन भर उपदेश सुनते रहने पर और भी अधिक भ्रमित हो जाता है।

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ಪಞ್ಚದಶಾಧ್ಯಾಯಃ

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೫

ಶ್ಲೋಕ ೧

ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಉವಾಚ --

ಯಥಾತಥೋಪದೇಶೇನ ಕೃತಾರ್ಥಃ ಸತ್ತ್ವಬುದ್ಧಿಮಾನ್||

ಆಜೀವಮಪಿ ಜಿಜ್ಞಾಸುಃ ಪರಸ್ತತ್ರ ವಿಮುಹ್ಯತಿ||೧||

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Ashtavakra Gita

Chapter 15

Stanza 1

Ashtavakra said --

A man of pure intellect has his (life's) object fulfilled even by instruction casually imparted. The other is bewildered there after enquiring throughout the whole life.

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Saturday, 8 April 2023

अन्तर्विकल्पशून्यस्य

अष्टावक्र गीता

अध्याय १४

श्लोक ४

अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिःस्वच्छन्दचारिणः।।

भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते।।४।।

(अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः। भ्रान्तस्य इव दशा ताः ताः तादृशा एव जानते।।)

"ज्ञा" - उभयपदी धातु लट् लकार, बहुवचन आत्मनेपदी :

प्रथम पुरुष  जानीते (एकवचन) जानते (द्विवचन) जानते (बहु-वचन) -- वे जानते हैं।

अर्थ : ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष जिनके हृदय संशय-विकल्परहित होते हैं, और बाह्य आचरण स्वच्छन्द, यद्यपि उनकी दशा भ्रान्त जैसी प्रतीत हो सकती है और उन्हें वे ही जानते हैं जो उस दशा को जानते हैं।

||इति चतुर्दशाध्यायः||

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೪

ಶ್ಲೋಕ ೪

ಅನ್ತರ್ವಿಕಲ್ಪಶೂನ್ಯಸ್ಯ ಬಹಿಃಸ್ವಚ್ಛನ್ದಚಾರಿಣಃ||

ಭ್ರಾನ್ತಸ್ಯೇವ ದಶಾಸ್ತಾಸ್ತಾಸ್ತಾದೃಶಾ ಏವ ಜಾನತೇ||೪||

||ಇತಿ ಚತುರ್ದಶಾಧ್ಯಾಯಃ||

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Ashtavakra Gita

Chapter 14

Stanza 4

The different conditions of one who within is devoid of doubts but who without moves about at his own pleasure like a deluded person, can only be understood by those like him.

Thus concludes chapter 14 of the text :

Ashtavakra Gita. 

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Friday, 7 April 2023

विज्ञाते साक्षिपुरुषे

अष्टावक्र गीता

अध्याय १४

श्लोक ३

विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे।।

नैराश्येबन्धमोक्षे च न चिन्ता मुक्तये मम।।४।।

(विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि च ईश्वरे। नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्ता मुक्तये मम।।)

अर्थ : परमात्मा और ईश्वर, -साक्षिपुरुष को जान लिए जाने पर अब बन्धन और मोक्ष की आशा और निराशा से न तो मेरा कोई प्रयोजन, और न उसकी चिन्ता ही रह गई है।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೪

ಶ್ಲೋಕ ೩

ವಿಜ್ಞಾತೇ ಸಾಕ್ವಿಪುರುವೇ

ಪರಮಾತ್ಮನಿ ಚೇಶ್ವರೇ ||

ನೈರಾಶ್ಯೇ ಬನ್ದಮೋಕ್ಷೇ ಚ

ನ ಚಿನ್ತಾ ಮುಕ್ತಯೇ ಮಮ||೩||

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Ashtavakra Gita

Chapter 14

Stanza 3

As I have realized the Supreme Self Who is the Witness and the Lord, and have lost all desire for bondage and liberation, I feel no anxiety for emancipation.

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