Monday, 2 September 2024

I, Me and My Alter-ego.

The Essential Trinity

Perception, Gestalt and The Algorithm.

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Trying to understand and in this way knowing myself I could discover this Essential Trinity that Is I'm and is my Alter-ego. Of course I'm visibly the self, say 'a self's like so many innumerable souls in the world. Though the World appears and disappears too before me repeatedly in an unending sequence of events; is face to face to me also, when I turn away my eyes from it, I remain the only thing made of a couple of the self / me and my Alter-ego.

Though I'm visibly and invariably the self or the ego, I exist as this pair of the two in myself.

Recently, in fact this morning I came to realize how the two always co-exist and together form what I'm in the eyes of the world of my perception. 

So the perception is the very ground on which I come across the world (or say my world).

Living in harmony and peace with this interminant world, I have a medium of interaction with the world.

This medium is again a couple made of the gestalt and the algorithm that is with me always. No doubt, this medium is as and according to my past experiences in dealing with the world, I constantly keep on trying to bring a change in their mode of working. The core-issue is finding out who's who! Though I'm really always the same, the unique self, my ego (or say, the ego) and the Alter-ego together appear and disappear simultaneously at once and I because of In-attention, fail to see what's all this about! 

So the ego / self and the Alter-ego talk to one another and I literally get "lost" in their mutual conversation.

In the common words : I talk to myself, I get split into the duo and just can't see and remember :

"Who the real I'm?"

I'm neither of the two. I see them talking of and about so many ideas and concepts and thereby I get trapped into believing the dream they cast upon me.

I like, watching the dream with rapt attention getting involved, indulging in it.

I know but tend to forget that a dream is but a dream only. Neither true nor false.

I define and redefine myself repeatedly.

I become self, ego and Alter-ego for the time being.

The magic and the miracle last but for a brief time, appearing as if unending.

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The way I Understand!

ऋषि कणाद का वैशेषिक दर्शन

जैसा कि मैंने समझा, कणाद उस ऋषि का उपनाम था, जिन्होंने न्याय दर्शन  की शाखा वैशेषिक दर्शन  का आविष्कार किया क्योंकि ऋषि सत्य का दर्शन करते हुए सिद्धान्तों का आविष्कार करते हैं न कि स्थापना, जैसा कि आधुनिक समझे जानेवाले भौतिक विज्ञान के मत को स्थापित करते हैं जो किसी तथ्य को तात्कालिक रूप से व्याख्यायित तो करता है किन्तु कालान्तर में उसे पुनः संशोधित किया जाना आवश्यक हो जाता है। वैज्ञानिक रीति से तथ्यों को समझने का तरीका प्रमाण पर निर्भर होता है जिसे असत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता है।

पतञ्जलि के योग-दर्शन के अनुसार प्रमाण एक वृत्ति विशेष का ही एक प्रकार होता है -

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः।। 

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः।।

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि।।

इसलिए प्रमाण नामक वृत्ति आकलन (evaluation) का ही एक रूप है, जो प्रत्यक्ष इन्द्रिय-संवेदन से, बौद्धिक आकलन से बुद्धिगम्य या जिसे प्रयोग के द्वारा निष्कर्ष के रूप में प्राप्त कर तात्कालिक रूप से सत्य मानकर लिया जाता है। प्रथम को प्रत्यक्ष, द्वितीय को अनुमान  और अंतिम को आगम कहा जाता है। इसीलिए वैदिक शास्त्र भी तदनुसार लौकिक, दैविक और आध्यात्मिक आधार पर ज्ञान का वर्णन इन तीनों प्रकारों से करते हैं। किन्तु इन तीनों ही छः दर्शनों  पर आधारित और उन पर ही आश्रित होते हैं। इन छः दर्शनों को क्रमशः :

साँख्य, कर्म-पूर्वमीमांसा, न्याय, योग और उत्तर-मीमांसा, वैशेषिक और (वेदान्त) के नाम से जाना जाता है।

न्यायदर्शन की ही एक शाखा है - वैशेषिक दर्शन, जिसका आविष्कार महर्षि कणाद ने किया था। यह सूक्ष्म गणित पर आधारित विशेष दर्शन है जिसमें पदार्थ विज्ञान के सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया गया है।

यहाँ पर मुझसे कुछ त्रुटि हुई हो तो उसे कृपया सुधार लें। 

ऋषि कणाद का नाम का अर्थ :

कणं अत्ति इति कणादः 

से समझा जा सकता है। जैसे पिप्पलाद ऋषि पीपल के वृक्ष के फलों को खाते थे, उसी प्रकार कणाद ऋषि खेत करने के बाद उसमें पड़े अन्न-कणों का संग्रह और सेवन कर उनसे अपनी भूख मिटाते थे।

वैसे कण शब्द का एक अर्थ तो कं (किसे), और दूसरा क  अर्थात् आकाश (space) भी हो सकता है जैसा कि कमण्डल शब्द की व्युत्पत्ति से स्पष्ट है। "क" का अर्थ "चारों ओर" भी होता है, जैसा कि कपाल, कपोल, कन्ध / स्कन्ध, कर (हाथ), कटि (कमर) और कफोघ्नि (कोहनी) आदि संस्कृत शब्दों से देखा जा सकता है। कण शब्द का तीसरा अर्थ है पदार्थ (material) या द्रव्य यह जानना रोचक है कि पदार्थ आकाश को और आकाश पदार्थ / द्रव्य को खा जाता है। और इसीलिए आकाश (Space) और पदार्थ (material) दोनों ही पञ्च-महाभूत कहे जाते हैं। दोनों ही अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से अव्यक्त में आते जाते रहते हैं -

अव्यक्तादीनि भूतानि मध्यव्यक्तानि भारत।।

अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।

आकाश शून्य, एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः या सात आयामों से युक्त है।

सबमें व्याप्त है और सब  में ही ओत प्रोत है।

भूः भुवः स्वः क्रमशः तीन आयाम हैं जिनमें से प्रथम स्थूल या भौतिक, द्वितीय सूक्ष्म या दैविक / मानसिक और तृतीय जैसा कि नाम से स्पष्ट ही है, स्वपरक या अनंता / अस्मिता / चेतना (consciousness) का आयाम है। प्रथम बिन्दुमात्र है, जिससे सब व्यक्त होकर पुनः जिसमें लौट जाता है। यह नेत्र और दृष्टि भी है। आयामशून्य भी है और सातों आयामों के रूप में व्यक्त स्वरूप भी ग्रहण करता है।

जैसे द्विआयामी भौतिक जगत में एक समतल पर एक सरल रेखा एक आयामी होती है, किन्तु दीर्घवृत्त या वृत्त द्विआयामी होता है। पुनः वृत्त एक-नेत्र (univocal) जबकि दीर्घ-वृत्त द्विनेत्र होता है।

इसे इस प्रकार से समझ सकते हैं :

वृत्त में एक केन्द्र होता है जिसके चारों ओर एक बिन्दु के उससे समान दूरी पर परिभ्रमण करने से वृत्त की रचना होती है। इसी प्रकार एक समतल पर स्थित दो बिन्दुओं के चारों ओर घूमता हुआ एक बिन्दु जिसकी इन दोनों बिन्दुओं से दूरियों का योग स्थिर और सुनिश्चित हो, एक दीर्घवृत्त की रचना करता है। उदाहरण के लिए परिकर (compass) में एक पेन्सिल लगाकर जैसे एक वृत्त की रचना की जा सकती है, उसी तरह दो स्थिर बिन्दुओं के चारों ओर यदि एक बिन्दु इस प्रकार परिभ्रमण करने कि दोनों से उसकी दूरियों का योग सुनिश्चित हो तो हमें एक दीर्घवृत्त प्राप्त होगा। इस स्थिति में दीर्घवृत्त के दो केन्द्र या नेत्र हैं ऐसा कह सकते हैं। (वैसे यदि आपकी रुचि हो तो किसी कागज पर दो पिन लगाकर एक पेन्सिल और एक धागे की सहायता से भी धागे को पिनों के चारों ओर घुमाकर उसमें पेन्सिल रखकर एक दीर्घवृत्त की रचना कर सकते हैं।)

जैसे किसी त्रिआयामी वस्तु का चित्र द्विआयामी समतल पर बनाया जा सकता है, उसी प्रकार इस स्थूल भौतिक जगत् में चार आयामी स्व पुनः पुनः किसी भौतिक शरीर के तीन आयामों में व्यक्त और अव्यक्त होता रहता है। यह चतुरानन चार आयामी सतह ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा है

अब पुनः इस त्रिआयामी जगत में स्थित दो स्थूल पिण्डों का विचार करें। जैसे अभी हमने एक दीर्घवृत्त की रचना कैसे होती है इसे समझा, उसी प्रकार जब पदार्थ अनेक छोटे-बड़े पिण्डों में टूटता है तो विभिन्न पिण्डों के बीच गुरुत्व बल की शक्ति के अनुपात में या तो दोनों परस्पर मिल जाते हैं, या अपनी अपनी विशिष्ट दिशाओं की ओर जाते हैं। अब हम रॉकेट साइन्स का उदाहरण देखें - जब किसी रॉकेट को लॉन्च किया जाता है और जब वह एक निश्चित गति से पृथ्वी से दूर जा रहा होता है तो जैसे जैसे पृथ्वी से उसकी दूरी बढ़ती है, उस पर लगने वाला पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल तब तक क्षीण होता रहता है, जब तक कि रॉकेट पर लगनेवाला यह बल बिलकुल ही शून्य नहीं हो जाता। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से बँधा रॉकेट फिर भी पृथ्वी की उस कक्षा से बाहर नहीं निकल पाता किन्तु उसकी दिशा अवश्य ही बदल जाती है और वह किसी वृत्ताकार या दीर्घवृत्ताकार कक्षा में पृथ्वी के चारों ओर चक्कर काटने लगता है।

पहले दिए गए वृत्त और दीर्घवृत्त की रचना से यह समझा जा सकता है कि कैसे विभिन्न उपग्रह किसी ग्रह के चारों ओर, और सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर किसी वृत्ताकार या दीर्घ वृत्ताकार कक्षा में परिभ्रमण करते हैं।

इसे एक और प्रयोग कर आप अच्छी तरह यह देख भी सकते हैं कि कैसे ये सभी ग्रह एक ही समतल में स्थित होते हैं। एक लंबी रस्सी में थोड़ी थोड़ी दूरी पर छोटे-बड़े पत्थर बाँध दीजिए और रस्सी को एक सिरे से पकड़कर कुछ तेज तेज घुमाइये, जैसे कि बच्चे कभी कभी रस्सी के एक सिरे पर एक पत्थर बाँधकर खेल खेल में रस्सी को गोल गोल घुमाता हैं। आप देख सकते हैं कि रस्सी में बँधे सभी पत्थर एक ही समतल में रहते हुए केन्द्र के उस बिन्दु की परिक्रमा करने लगते हैं।

इसकी कल्पना मेरे मन में उस समय उठी जब मैं करीब नौ वर्षों पहले वाल्मीकि रामायण पढ़ रहा था जिसमें यह वर्णन है कि जब भगवान राम के कुल में उत्पन्न त्रिशंकु नामक उनका पूर्वज सशरीर देवलोक जाना चाहता थे और इसके लिए उन्होंने ऋषि विश्वामित्र की सहायता ली तो देवलोक अर्थात् सूर्य और उसके चारों तरफ परिक्रमा करनेवाले ग्रहदेवताओं ने इस पर आपत्ति की। किन्तु वे सभी ऋषि विश्वामित्र से डरते भी थे। अंततः इन्द्र आदि ने ऋषि की प्रार्थना की और उन्हें इसके लिए राजी किया कि राजा त्रिशंकु को उनके देवलोक के इस समतल से भिन्न तिर्यक् दिशा में स्थान दे दिया जाए। त्रिशंकु नाम से ही हम समझ सकते हैं कि यह राजा का नहीं, बल्कि उस अंतरिक्षयान का नाम है जिसमें तीन शंक्वाकार सिरे हों, जैसा कि आधुनिक उपग्रहों में भी देखा जा सकता है।

महर्षि कणाद ने इसी सिद्धान्त के आधार पर वैशेषिक दर्शन का आविष्कार किया जिसमें सामान्य और विशेष तत्वों का वर्णन है।

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Sunday, 25 August 2024

NH44

श्रीनगर से कन्याकुमारी

राजमार्ग पर,

नर्मदा किनारे सातधारा नामक ग्राम राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर स्थित है। यहाँ से 14 किलोमीटर की दूरी पर करेली नामक स्थान है, जो मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले में है। करेली और नरसिंहपुर दोनों तक राष्ट्रीय राजमार्ग और रेल से भी जाया जा सकता है।

सुबह 06:00 बजे सातधारा ग्राम से चला था।

आज कुछ नया खोजना था। मेरा अनुमान था कि इस राजमार्ग पर कहीं से रास्ता नर्मदा सातधारा की तरफ मुड़ता है, जहाँ से बरमान घाट की ओर जाने के लिए एक पुल है, जबकि मुख्य मार्ग NH-44 आगे झाँसी की तरफ निकल जाता है।

जहाँ सातधारा ग्राम है, उसे बरमान कलान भी कहते हैं।  NH-44 पर झाँसी (387 किलोमीटर) की दिशा में आगे जाने पर पुनः एक प्रशस्त पुल रास्ते पर है।

आज वहाँ तक पैदल जाने का प्रयास किया। दोनों ही रास्तों से बरमान घाट तक जाया जा सकता है। अद्भुत् शान्तिपूर्ण स्थान जहाँ पर चिड़ियों और छोटे बड़े जंगली पक्षियों के झुण्ड कलरव करते रहते हैं। मनुष्य तो यहाँ बहुत कम दिखलाई पड़ते हैं। परसों, कल और आज भी यहाँ उन सेवन सिस्टर्स के दर्शन हुए, जिन्हें पिछली बार पुराने जंगल हाउस में राघवी से शक्करखेड़ी के रास्ते पर रहते समय प्रायः देखा करता था। वे अचानक प्रकट हो जाती हैं और समवेत स्वरों में "दिव्य दिव्य दिव्य दिव्य" का उद्घोष करती जान पड़ती हैं। अंग्रेजी भाषा में उन्हें warblers  कहा जाता है। सबसे पहले उन्हें वाराणसी में राजघाट पर स्थित कृष्णमूर्ति फॉउन्डेशन में 2002 में देखा था।

कुकू-हॉक भी दिखाई दिया। यह पक्षी भी पूरे भारतवर्ष में दिखाई देता है। और वह शरमीला फाख्ता भी जो कि  प्रायः जोड़े में रहता है।

लेकिन सबसे आश्चर्यजनक दर्शन तो घोंघे के हुए जिन्हें पहले कभी चम्पा के पेड़ों पर भी बहुतायत से देखा था। 

यहाँ सातधारा में वे इतनी बड़ी आकृति में दिखाई देते हैं। 






ये महाशय तो नर्मदा रोड पर बेख़ौफ चले जा रहे थे जहाँ लगातार ट्रक और दूसरी गाड़ियाँ आ-जा रही थीं। एक लकड़ी से उन्हें रास्ते से हटाकर कच्ची जमीन पर रख दिया। सद्दर्शनम् का श्लोक 13 एक शॉर्ट वीडियो के रूप में मेरे YouTube  पर अपलोड किया :

बोद्धारमात्मानमजानतो यो,

बोधः स किं स्यात् परमार्थबोधः।।

बोधस्य बोध्यस्य च संश्रयं स्वं

विजानतस्तद्-द्वितयं विनश्येत्।। 

सातधारा से धर्मपुरी तक पैदल जाकर बड़े पुल से जरा पहले सातधारा तक अब लौट आया हूँ। भोजन आ गया है, भूख भी लग रही है।

नर्मदे हर!!

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Tuesday, 20 August 2024

The Three Idiots.

The Ignorant, The Atheist, and

The Skeptic 

Shrimadbhagvad-gita declares :

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।।

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।। 

Vivekachudamani verse 125 describes : 

Self  is the undeniable and indisputable Reality as is described as follows :

अस्ति कश्चित् स्वयं नित्यं 

अहं-प्रत्ययलम्बनः।।

अवस्था-त्रय साक्षी सन् 

पञ्चकोषविलक्षणः।।१२५।।

Everyone spontaneously knows of one's own existence without any doubt.

Everyone also knows without least doubt or suspicion any that the self exists while one is either in a dream, in the waking or in the dreamless sleep state of mind and refers to it as "I" .

And at the same time everyone though unaware , if tries to find out can see for oneself that the physical body is made of food, the vital body which enables the vital functions is made of energy, and the mental body through which one thinks and feels, experiences, remembers and imagines is made of thought. Again the faculty of discrimination, discernment is mode of and made of Intellect while the element of happiness or the joy everyone seeks always is the undeniable and the  underlying ever-present principle.

These 5 sheaths that cover up the simple and pure sense of 

Simple Being and Knowing  where self knows it is, and knowing too is, become the sense  I am someone other  than this world where I as an individual was born, live and shall die someday in the future.

This Being is Knowing and Knowing is Being. This together is Happiness.

Being, Knowing and Happiness is the Self and has nothing what-so-ever common with the three states and the five sheaths described above.

The three states are the waking, the dream and the dreamless sleep. 

The five sheaths are the one made of the food, the one made of the energy, the one made of the mind / thought, the one made of Intellect and the last made of Happiness.

Covered up under and within these five sheaths of body and three states of mind, one becomes the victim of ignorance, has no faith to support on or becomes skeptic.

Though all are convinced and have no ignorance, doubt or suspicion if I exist not, they question the existence of the very source from where this I emerges out when one wakes up from sleep.

The stanza referred to above insists that there is a ever-existent support which gives rise to this persistent I-sense and the same through error of judgement is superimposed upon the pure sense of Being and Knowing.

The ignorant is -

अज्ञ, 

The atheist who doubts is -

अश्रद्दधानः 

And the skeptic is -

संशयात्मा 

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Monday, 19 August 2024

The Faithful Friend.

श्वान गाथा 

-- ऋषि शौनक कल्पित --

वे नागर अर्थात् नागरिक ऋषि थे। उन दिनों वैसे भी सर्वत्र और संपूर्ण पृथ्वी पर सनातन वैदिक धर्म ही प्रचलित था। और चूँकि धर्म का अर्थ ही है सनातन, इसलिए सनातन शब्द के साथ धर्म शब्द का प्रयोग वैसा ही अनावश्यक और व्यर्थ का दोहराव है, जैसा कि शक्कर शब्द के साथ मीठा शब्द का प्रयोग।

और चूँकि सदा से अर्थात् सनातन रूप से सभ्यताएँ, संस्कृतियाँ, परम्पराएँ आदि जहाँ भी जिस भी रूप में जीवन है, वहाँ सदा से सर्वत्र ही विद्यमान होती हैं। जीवन इसीलिए सनातन और नित्य धर्म है। जब तक जीवन है तब तक धर्म भी है और जीवन की ही तरह धर्म भी प्रत्येक जीवन जीनेवाले का स्वाभाविक और अनायास उसे प्राप्त हुआ उसका धर्म है। यह पुनः उस जाति का विशेष और सभी का, फिर चाहे उसका जन्म अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज या जरायुज किसी भी रूप में क्यों न हुआ हो जाति का सामान्य धर्म है। जरायुज अर्थात् गर्भ से जन्म लेनेवालों में भी अनेक प्रकार के बहुत से प्राणी हैं, और उनमें से प्रत्येक का अपना विशेष धर्म होता है। कुछ सभ्य अर्थात् परिवार या समूह में रहते हैं तो कुछ लगभग परिवारविहीन जैसा व्यक्तिगत जीवन जीते हैं और उसी धर्म से प्रेरित होकर प्रजनन की ऋतु आने पर अपनी प्रजाति को जन्म देने और उसका विस्तार करने के लिए कुछ समय के लिए दाम्पत्य धर्मकको स्वीकार कर उस कर्तव्य को पूर्ण कर पुनः परिवारविहीन जैसा जीवन जीने लगते हैं, जैसे कि श्वान, विडाल, सिंह आदि जन्तु। जबकि दूसरी ओर ऐसे भी कुछ जन्तु होते हैं जो परिवार अर्थात् समूह में जन्म लेते हैं और समूह में ही पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं -जैसे कि मृग, हाथी, अश्व, श्वान, भेड़, बकरियाँ, गौ और सर्वाधिक रूप से महत्वपूर्ण है मनुष्य।

मनुष्य वह विशिष्ट प्राणी है जो न तो चतुष्पद होता है और न ही पक्षियों की तरह उड़ने में सक्षम द्विपद। मनुष्य की जाति जैसे ही यक्ष, राक्षस, गंधर्व, नाग और किंनर भी होते हैं, और उनका भी अपना समाज होता है। किन्तु सभी के पूर्वज ऋषि ही होते हैं। जैसे पुलस्त्य ऋषि के कुल में रावण, कुंभकर्ण, विभीषण हुए वैसे ही दैत्य Dutch, Deutsche, कुल में प्रह्लाद  का जन्म हुआ जो नारायण के भक्त थे।

शौनक ऋषि समस्त वेदों के ज्ञाता थे और उनके महाविद्यालय, महाशाल गुरुकुल में पश्चिम से अध्ययन करने के लिए सैकड़ों छात्र आया करते थे। परन्तु ऋषि यह नहीं समझ पा रहे थे कि किस कारण से उनका मन व्याकुल रहता है। इसलिए अपने कुछ विशिष्ट शिष्यों के साथ महर्षि अङ्गिरा के आश्रम में आए।

आगे की कथा मुण्डकोपनिषद् में पढ़ सकते हैं। 

ऋषि शौनक का एक पालतू श्वान था जो उनके वहाँ से भारत चले आने से बहुत दुःखी था और उनके आश्रम में या कहीं भी इधर उधर भटकता रहता था। बहुत से लोग उसे जानते भी थे, किन्तु वह उन सबसे उदासीन अपने दुःख में डूबा हुआ शौनक ऋषि को याद करता रहता था।

ऐसे ही शीत ऋतु के एक दिन वह खुली धरती पर धूप में सुख से लेटा हुआ था। तभी कहीं से एक बन्दर आया और उसने उस श्वान के समक्ष मित्रता का प्रस्ताव रखा। थोड़ी ना नुकर के बाद श्वान ने वह मैत्री प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 

अब वे दोनों प्रायः साथ रहते, और मन होने पर एक दूसरे से खेला भी करते थे किन्तु श्वान को वनस्पति, फल, फूल और पत्तियों से परहेज था जबकि बन्दर को मांसाहार से।

"तुम उदास क्यों हो?"

एक दिन बन्दर ने श्वान से पूछा। 

"मुझे मेरे स्वामी की याद आ रही है, पता नहीं मुझे अकेला छोड़ वे कहाँ चले गए हैं।"

"थोड़ा धीरज रखो, ये मनुष्य जाति के लोग और विशेष रूप से उनमें भी, ऋषि लोग कुछ विचित्र प्रकृति के होते हैं। वे स्वयं ही किसी समय लौट आएँगे।"

"क्या तुम्हें पता है, लोग हमारे बारे में क्या क्या बातें करते हैं?"

श्वान ने प्रश्न किया। 

"करने दो, इसकी चिन्ता ही मत करो। वे न तो शक्ति में, और न ही बुद्धि में हमसे अधिक बलशाली हैं!"

"तुम्हें कैसे पता?"

"क्योंकि हम तो उनकी बातें सुनते और समझते रहते हैं,किन्तु उन्हें तो इसकी कल्पना तक नहीं होती कि हम उनकी बातों को न सिर्फ सुनते हैं, बल्कि किसी हद तक समझने भी लगते हैं। किन्तु हमें उनसे सावधान तो रहना ही चाहिए, क्योंकि वे हमसे अधिक चालाक होते हैं। इसका कारण है उनकी बुद्धि।"

"बुद्धि क्या होती है?"

"बुद्धि का मतलब शायद "विचार" होता है।"

"और 'विचार' क्या होता है?"

"कोई भी विचार कुछ शब्दों का समूह और विस्तार होता है।"

"और 'शब्द'?

"शब्द कुछ ध्वनियों का समूह होता है।"

श्वान चुप हो गया। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। ऐसे ही दोनों के दिन के रहे थे। एक दिन वे साथ साथ घूमते हुए बहुत दूर तक चले गए जहाँ हनुमानजी का एक मन्दिर था। हनुमान जी के बहुत से भक्त मन्दिर में आ जा रहे थे वहाँ सब मिलकर भोजन कर रहे थे। जब श्वान वहाँ जाने का उपक्रम करने लगा तो लोगों ने उसे वहाँ से भगा दिया किन्तु बन्दर जब सावधानी से धीरे धीरे अन्दर जाने लगा तो पहले तो लोग कौतूहल से उसे देखते रहे कि वह क्या करता है। तब वह धीरे धीरे उनके सामने से गुजरात हुआ मन्दिर में प्रविष्ट हो गया। किसी ने भी न उसे न तो रोका न दूर भगाया। हनुमानजी की मूर्ति के पास गया और सामने चढ़ाऊ गए प्रसाद की थाली को भी देखा तो उसे समझ में आया कि इसमें खाने की चीजें हैं। उसने सोचा कि इसमें से श्वान क्या खा सकेगा! उसने एक लड्डू उठाया और धीरे धीरे बाहर निकल आया। उसने लड्डू श्वान को दिया तो श्वान को लड्डू बहुत पसन्द तो नहीं आया पर भूख लगने के कारण उसने उसे खा लिया। दूसरी बार बन्दर भोजन कर रहे लोगों के बीच जा पहुँचा  तो देखा वे लोग खीर पूरी खा रहे थे। उसके सामने एक व्यक्ति ने घी की पूरियाँ पत्तल पर रखी तो उसने झपटकर चार पाँच पटरियाँ उठा लीं और शान्तिपूर्वक वहाँ से बाहर आ गया। दोनों मित्रों ने पेट भर खाना खाया तो श्वान बोला -

"अब चलें?"

"रुको, मैं अभी आता हूँ।"

कहकर बन्दर फिर मन्दिर में चला आया। वह' सोच रहा था कि भीतर जाकर भरपेट केले खाएगा, लेकिन इससे पहले ही जब  एक बच्चे ने उसके सामने केले रख दिए तो वह वहीं बैठ गया। और भी लोग उसे मिठाई ओर काले देने लगे तो पेट भर जाने तक वह खाता रहा। फिर उसने सोचा, उस बच्चे को आशीर्वाद दिया जाए तो वह बच्चे के पास गया और उसके सिर पर हाथ रखा। फिर और भी लोगों के सिर पर हाथ रखा। यह सब उसने पहले ही सीख लिया था जब उसने मन्दिर में प्रवेश करते समय कुछ लोगों को ऐसा करते देखा था।

फिर दोनों वहाँ से लौट आए। दोनों को नींद आ रही थी तो पास की ही साफ जगह पर जाकर सो गए। एक दो घंटे बाद वापस अपने स्थान पर आ गए। 

ऐसे ही एक दिन दोनों गणेशजी के मन्दिर में जा पहुँचे। वहाँ भी वानर का स्वागत हुआ और दोनों को भरपेट मिठाई, भोजन भी मिल गया। फिर बहुत दिनों तक ऐसा कोई अवसर नहीं मिला। बन्दर तो फल-फूल आदि खाकर अपना पेट भर लेता और श्वान के लिए भी कुछ न कुछ ले आता।

एक दिन वहाँ एक हाथी आया। पहले तो श्वान उससे डर गया और भौंकने लगा। तब बन्दर ने उसे समझाया -

"हाथी तो बस पत्ते, फल-फूल, रोटी और मिठाई खाता है। तुम्हें उससे डरना नहीं चाहिए।"

तब दोनों ने धीरे धीरे हाथी से दोस्ती कर ली और हाथी भी कभी कभी उन्हें सूँड से उठा लेता और अपनी गर्दन पर बिठा लिया करता।

बहुत दिनों बाद श्वान को वही पुराना सवाल याद आया -

"बुद्धि क्या है?"

तब बन्दर ने उसे समझाया -

"शब्दों को किसी वस्तु से जोड़कर देखने के तरीके को बुद्धि कहते हैं। जैसे "भौं-भौं" मतलब तुम, "खौं-खौं" मतलब "मैं"!"

अब श्वान को बन्दर की कही उस दिन की वह बात समझ में आ गई, जब उसने उसे बताया था कि वह कैसे लोगों की बातों को सुनकर उसका मतलब समझ लेता है। तब श्वान ने तय किया कि अब रह भी मनुष्यों की बातों को ध्यानपूर्वक सुना करेगा। साल भर में श्वान को भी मनुष्यों की बातें समझ में आने लगी। लेकिन उसे यह समझ पाने में अब भी कठिनाई अनुभव हो रही थी कि "बुद्धि" शब्द का क्या मतलब है! बन्दर स्वयं भी अनुभव कर रहा था कि उसे यह शब्द तो पता है किन्तु यह नहीं पता कि यह शब्द किस वस्तु का सूचक है!

"मैं कोई दूसरा तरीका खोजता हूँ।"

- बन्दर ने सोचा।

तब उसे स्पष्ट हुआ कि दो घटनाओं या स्थितियों को एक दूसरे से जोड़कर देखना ही "बुद्धि" या बुद्धि का कार्य है। जैसे -

भूख लगने पर यह जानना कि कुछ खाने से या भोजन करने से भूख से होनेवाली तकलीफ दूर हो जाती है। तो "जानना" ही "बुद्धि" अर्थात् "बुद्धि" का कार्य है। तब उसने सोचा कि हाथी दादा से पूछकर देखें क्या उसे यह पता है!

जब उसने हाथी से पूछा तो हाथी ने कहा -

"जानना" तो इन्द्रियों का कार्य है और एक वस्तु या घटना का दूसरी वस्तु या घटना से क्या संबंध है या हो सकता है यह बुद्धि या बुद्धि का कार्य है।

अब हाथी को मजाक सूझी। उसने बन्दर से पूछा -

"अच्छा बताओ, बुद्धि या बुद्धि के कार्य को कैसे जाना जाता है और कौन इसे जानता है?"

बन्दर को सपने में भी हाथी से ऐसा सवाल सुनने की उम्मीद नहीं थी। जब बहुत देर तक बन्दर सिर खुजलाता रहा तो हाथी बोला "जानना" कोई वस्तु या कार्य नहीं है। "जानना" आत्मा का धर्म  है। "जानना" ही आत्मा है,  और आत्मा ही "जानना" है।

"और मैं?"

"तुम खौं-खौं हो!"

हाथी ने मुस्कराते हुए कहा। 

"नहीं, खौं-खौं तो वैसे ही इस शरीर का नाम है जैसे भौं-भौं उस शरीर का, जिसे श्वान कहा जाता है!"

अब चौंकने की बारी हाथी की थी।

तीनों मित्र बहुत समय तक इसी तरह आपस में बातचीत और हँसी-मजाक किया करते थे। 

आज जब बन्दर और हाथी उसे छोड़कर जा चुके हैं तो श्वान फिर अकेलापन अनुभव कर रहा है। उसे उसके स्वामी की याद आने लगी। पता नहीं वे कब तक लौटेंगे!

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी।।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।

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Tuesday, 16 July 2024

साक्षी वर्तमान है।

इतिहास साक्षी है!

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मैं बहुत असंतुष्ट हूँ। इसलिए नहीं कि मैंने विवाह नहीं किया, बच्चे नहीं पैदा किए। इसलिए भी नहीं कि मैंने अपना 'घर' भी नहीं बनाया। ये चीजें मैंने कभी चाही ही कहाँ थीं! इसलिए भी नहीं कि अपनी युवावस्था में मैं उन तमाम सच्चे-झूठे बाबाओं से मिलता रहा जिसमें अन्त में मैंने व्यर्थ समय गँवाया। बल्कि केवल इसलिए क्योंकि इस दौरान कई ऐसे लोगों से पाला पड़ा, गलतफहमी से जिन्हें मैंने अपना मित्र बना लिया। आधे अधूरे बाबाओं में से अनेक तो दिवंगत हो चुके हैं और मेरे पुराने मित्रों में से भी बहुत से जा चुके हैं। बस लेकिन उन मित्रों के बारे में जरूर लगता है जिन्होंने माया - जैसे कार, आलीशान मकान और गृहस्थों से अध्यात्म या धर्म के बहाने संपत्ति भी पा ली होगी लेकिन अब जीवन लगभग घसीटते हुए खींच रहे हैं। जीवन में उदासी घर कर गई है न भोजन का सुख है, न स्वास्थ्य और उमंग है। चेहरा क्लान्त और निस्तेज है, यद्यपि कभी कभी मिलने के लिए आनेवालों से मिलते समय और वैसे भी प्रायः Men's Parlour  से शरीर और चेहरे को टोन अप करवाते रहते हैं। कई असाध्य रोगों से त्रस्त हैं और अच्छी तरह जानते है कि किसी भी समय  अप्रत्याशित रूप से यहाँ से चले जाना है। मृत्यु के बाद क्या होता होगा, इससे भी अधिक चिन्ता और निराशा उन्हें जीते जी इसलिए भी है क्योंकि शरीर जर्जर, दुर्बल और रुग्ण है। लोग भी जानते हैं लेकिन क्या कर सकते हैं? तो मैं क्यों असन्तुष्ट हूँ? 

क्योंकि मैं जानता हूँ कि उनके इर्द-गिर्द जमा होनेवाले लोग उनके हितैषी हरगिज़ नहीं हैं। वे अपने आप तक के हितैषी नहीं हैं। वर्षों से साथ रहते हुए बस एक आदत भर हो गई है, रोज रोज मिलते रहने की।

सब के सब उनसे इसलिए मिलते रहते हैं क्योंकि उन सब के जीवन में एक रिक्तता, एक अभावात्मकता भरी हुई है। और इस अभावात्मकता और रिक्तता को भरने के लिए ही उनके पास आया करते हैं। दो या दो से अधिक शून्य परस्पर मिलकर क्या किसी के जीवन में भराव ला सकते हैं? हर कोई अपने खालीपन को भरने के लिए मनोरंजन का सहारा लेता है मनोरंजन हमें मूढ बना देता है। मनोरंजन तो एक विष ही है। तथाकथित सत्संग लोग इसीलिए करते हैं ताकि अपनी काल्पनिक लालसाओं को पूर्ण कर सकें। इसे हम आध्यात्मिक उन्नति कहते हैं। क्या आप नहीं देखते कि बाबा लोग कैसे बड़ी से बड़ी भीड़ अध्यात्म और धर्म के नाम पर आकर्षित करते हैं जबकि उन्हें भी पता नहीं होता कि इस सबसे कुछ होना जाना नहीं है बल्कि होता यह है कि सभी एक दूसरे से ऊर्जा खींचते और उसे व्यर्थ करते रहते हैं। इसीलिए मैं असंतुष्ट हूँ। और यह न सोचिए कि हम सब उनसे कुछ अलग हैं।  हम सभी एक दूसरे को निरन्तर और भी अधिक विनष्ट और भ्रष्ट करते जा रहे हैं। यह सब समझने के लिए बुद्धि सूक्ष्म, और प्रखर होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि विवेकयुक्त होना उससे भी कहीं अधिक आवश्यक है। लोभ और भय अज्ञान के ही लक्षण और परिणाम हैं, दोनों ही प्रमाद में ही उत्पन्न, विकसित होते हैं। प्रमाद ही एकमात्र पाप है और विवेक ही एकमात्र पुण्य है। जब तक हम प्रमाद से ग्रस्त हैं, किसी भी प्रकार के काल्पनिक  लोभ और भय से ग्रस्त हैं तब तक हमारे लिए कोई भविष्य, कहीं नहीं है। मेरे घर के आसपास हर घर के बाहर वाहनों और क्रोध की कारें लगी हैं। लोग बड़ी शान से उनका प्रयोग करते हैं। घरों के बाहर सीमा से परे फुटपाथ का अतिक्रमण कर लेते हैं, उन पर भी वृक्ष लगाकर सड़क और भी संकीर्ण कर देते हैं, क्योंकि कार रखने के लिए घर में गैराज नहीं है। लाखों रुपयों के मूल्य की कारों का स्वामित्व होने उन्हें और अधिक विलासप्रिय, आलसी बनाता  है। फिर वे जिम जाते हैं, घर में भी इस प्रकार के उपकरण रखते हैं जिस पर वे व्यायाम कर सकें। 

मैं उनसे और हर किसी से कहना चाहता हूँ, हम सभी अपनी आदतें बदलें, अच्छा और स्वास्थ्यप्रद संतुलित भोजन समय पर करें, नियमित रूप से व्यायाम करें, कृत्रिम उपायों से प्राप्त होनेवाली सुख सुविधाओं, समस्त भौतिक यन्त्रों को प्रयोग करना पूरी तरह से छोड़ दें, लोगों से मिलना जुलना कम से कम और आवश्यक होने पर ही करें। प्रकृति से प्राप्त स्वाभाविक जीवन-क्रम जीवन में अपनाए। सरलता से जियें और शास्त्रचर्चा, प्रवचन या उपदेश आदि लेने देने से परहेज करें। लेकिन मेरी इन बातों पर कोई कभी ध्यान तक नहीं देता। इसलिए मैं दुःखी तो नहीं किन्तु असन्तुष्ट भर अवश्य हूँ। 

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Monday, 27 May 2024

कथं!

संस्कृतम्

नाहं कश्चिन्न मम किञ्चन्।।

कथं वदेऽहं द्वैताद्वैतम्।।

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