Monday, 19 August 2024

The Faithful Friend.

श्वान गाथा 

-- ऋषि शौनक कल्पित --

वे नागर अर्थात् नागरिक ऋषि थे। उन दिनों वैसे भी सर्वत्र और संपूर्ण पृथ्वी पर सनातन वैदिक धर्म ही प्रचलित था। और चूँकि धर्म का अर्थ ही है सनातन, इसलिए सनातन शब्द के साथ धर्म शब्द का प्रयोग वैसा ही अनावश्यक और व्यर्थ का दोहराव है, जैसा कि शक्कर शब्द के साथ मीठा शब्द का प्रयोग।

और चूँकि सदा से अर्थात् सनातन रूप से सभ्यताएँ, संस्कृतियाँ, परम्पराएँ आदि जहाँ भी जिस भी रूप में जीवन है, वहाँ सदा से सर्वत्र ही विद्यमान होती हैं। जीवन इसीलिए सनातन और नित्य धर्म है। जब तक जीवन है तब तक धर्म भी है और जीवन की ही तरह धर्म भी प्रत्येक जीवन जीनेवाले का स्वाभाविक और अनायास उसे प्राप्त हुआ उसका धर्म है। यह पुनः उस जाति का विशेष और सभी का, फिर चाहे उसका जन्म अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज या जरायुज किसी भी रूप में क्यों न हुआ हो जाति का सामान्य धर्म है। जरायुज अर्थात् गर्भ से जन्म लेनेवालों में भी अनेक प्रकार के बहुत से प्राणी हैं, और उनमें से प्रत्येक का अपना विशेष धर्म होता है। कुछ सभ्य अर्थात् परिवार या समूह में रहते हैं तो कुछ लगभग परिवारविहीन जैसा व्यक्तिगत जीवन जीते हैं और उसी धर्म से प्रेरित होकर प्रजनन की ऋतु आने पर अपनी प्रजाति को जन्म देने और उसका विस्तार करने के लिए कुछ समय के लिए दाम्पत्य धर्मकको स्वीकार कर उस कर्तव्य को पूर्ण कर पुनः परिवारविहीन जैसा जीवन जीने लगते हैं, जैसे कि श्वान, विडाल, सिंह आदि जन्तु। जबकि दूसरी ओर ऐसे भी कुछ जन्तु होते हैं जो परिवार अर्थात् समूह में जन्म लेते हैं और समूह में ही पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं -जैसे कि मृग, हाथी, अश्व, श्वान, भेड़, बकरियाँ, गौ और सर्वाधिक रूप से महत्वपूर्ण है मनुष्य।

मनुष्य वह विशिष्ट प्राणी है जो न तो चतुष्पद होता है और न ही पक्षियों की तरह उड़ने में सक्षम द्विपद। मनुष्य की जाति जैसे ही यक्ष, राक्षस, गंधर्व, नाग और किंनर भी होते हैं, और उनका भी अपना समाज होता है। किन्तु सभी के पूर्वज ऋषि ही होते हैं। जैसे पुलस्त्य ऋषि के कुल में रावण, कुंभकर्ण, विभीषण हुए वैसे ही दैत्य Dutch, Deutsche, कुल में प्रह्लाद  का जन्म हुआ जो नारायण के भक्त थे।

शौनक ऋषि समस्त वेदों के ज्ञाता थे और उनके महाविद्यालय, महाशाल गुरुकुल में पश्चिम से अध्ययन करने के लिए सैकड़ों छात्र आया करते थे। परन्तु ऋषि यह नहीं समझ पा रहे थे कि किस कारण से उनका मन व्याकुल रहता है। इसलिए अपने कुछ विशिष्ट शिष्यों के साथ महर्षि अङ्गिरा के आश्रम में आए।

आगे की कथा मुण्डकोपनिषद् में पढ़ सकते हैं। 

ऋषि शौनक का एक पालतू श्वान था जो उनके वहाँ से भारत चले आने से बहुत दुःखी था और उनके आश्रम में या कहीं भी इधर उधर भटकता रहता था। बहुत से लोग उसे जानते भी थे, किन्तु वह उन सबसे उदासीन अपने दुःख में डूबा हुआ शौनक ऋषि को याद करता रहता था।

ऐसे ही शीत ऋतु के एक दिन वह खुली धरती पर धूप में सुख से लेटा हुआ था। तभी कहीं से एक बन्दर आया और उसने उस श्वान के समक्ष मित्रता का प्रस्ताव रखा। थोड़ी ना नुकर के बाद श्वान ने वह मैत्री प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 

अब वे दोनों प्रायः साथ रहते, और मन होने पर एक दूसरे से खेला भी करते थे किन्तु श्वान को वनस्पति, फल, फूल और पत्तियों से परहेज था जबकि बन्दर को मांसाहार से।

"तुम उदास क्यों हो?"

एक दिन बन्दर ने श्वान से पूछा। 

"मुझे मेरे स्वामी की याद आ रही है, पता नहीं मुझे अकेला छोड़ वे कहाँ चले गए हैं।"

"थोड़ा धीरज रखो, ये मनुष्य जाति के लोग और विशेष रूप से उनमें भी, ऋषि लोग कुछ विचित्र प्रकृति के होते हैं। वे स्वयं ही किसी समय लौट आएँगे।"

"क्या तुम्हें पता है, लोग हमारे बारे में क्या क्या बातें करते हैं?"

श्वान ने प्रश्न किया। 

"करने दो, इसकी चिन्ता ही मत करो। वे न तो शक्ति में, और न ही बुद्धि में हमसे अधिक बलशाली हैं!"

"तुम्हें कैसे पता?"

"क्योंकि हम तो उनकी बातें सुनते और समझते रहते हैं,किन्तु उन्हें तो इसकी कल्पना तक नहीं होती कि हम उनकी बातों को न सिर्फ सुनते हैं, बल्कि किसी हद तक समझने भी लगते हैं। किन्तु हमें उनसे सावधान तो रहना ही चाहिए, क्योंकि वे हमसे अधिक चालाक होते हैं। इसका कारण है उनकी बुद्धि।"

"बुद्धि क्या होती है?"

"बुद्धि का मतलब शायद "विचार" होता है।"

"और 'विचार' क्या होता है?"

"कोई भी विचार कुछ शब्दों का समूह और विस्तार होता है।"

"और 'शब्द'?

"शब्द कुछ ध्वनियों का समूह होता है।"

श्वान चुप हो गया। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। ऐसे ही दोनों के दिन के रहे थे। एक दिन वे साथ साथ घूमते हुए बहुत दूर तक चले गए जहाँ हनुमानजी का एक मन्दिर था। हनुमान जी के बहुत से भक्त मन्दिर में आ जा रहे थे वहाँ सब मिलकर भोजन कर रहे थे। जब श्वान वहाँ जाने का उपक्रम करने लगा तो लोगों ने उसे वहाँ से भगा दिया किन्तु बन्दर जब सावधानी से धीरे धीरे अन्दर जाने लगा तो पहले तो लोग कौतूहल से उसे देखते रहे कि वह क्या करता है। तब वह धीरे धीरे उनके सामने से गुजरात हुआ मन्दिर में प्रविष्ट हो गया। किसी ने भी न उसे न तो रोका न दूर भगाया। हनुमानजी की मूर्ति के पास गया और सामने चढ़ाऊ गए प्रसाद की थाली को भी देखा तो उसे समझ में आया कि इसमें खाने की चीजें हैं। उसने सोचा कि इसमें से श्वान क्या खा सकेगा! उसने एक लड्डू उठाया और धीरे धीरे बाहर निकल आया। उसने लड्डू श्वान को दिया तो श्वान को लड्डू बहुत पसन्द तो नहीं आया पर भूख लगने के कारण उसने उसे खा लिया। दूसरी बार बन्दर भोजन कर रहे लोगों के बीच जा पहुँचा  तो देखा वे लोग खीर पूरी खा रहे थे। उसके सामने एक व्यक्ति ने घी की पूरियाँ पत्तल पर रखी तो उसने झपटकर चार पाँच पटरियाँ उठा लीं और शान्तिपूर्वक वहाँ से बाहर आ गया। दोनों मित्रों ने पेट भर खाना खाया तो श्वान बोला -

"अब चलें?"

"रुको, मैं अभी आता हूँ।"

कहकर बन्दर फिर मन्दिर में चला आया। वह' सोच रहा था कि भीतर जाकर भरपेट केले खाएगा, लेकिन इससे पहले ही जब  एक बच्चे ने उसके सामने केले रख दिए तो वह वहीं बैठ गया। और भी लोग उसे मिठाई ओर काले देने लगे तो पेट भर जाने तक वह खाता रहा। फिर उसने सोचा, उस बच्चे को आशीर्वाद दिया जाए तो वह बच्चे के पास गया और उसके सिर पर हाथ रखा। फिर और भी लोगों के सिर पर हाथ रखा। यह सब उसने पहले ही सीख लिया था जब उसने मन्दिर में प्रवेश करते समय कुछ लोगों को ऐसा करते देखा था।

फिर दोनों वहाँ से लौट आए। दोनों को नींद आ रही थी तो पास की ही साफ जगह पर जाकर सो गए। एक दो घंटे बाद वापस अपने स्थान पर आ गए। 

ऐसे ही एक दिन दोनों गणेशजी के मन्दिर में जा पहुँचे। वहाँ भी वानर का स्वागत हुआ और दोनों को भरपेट मिठाई, भोजन भी मिल गया। फिर बहुत दिनों तक ऐसा कोई अवसर नहीं मिला। बन्दर तो फल-फूल आदि खाकर अपना पेट भर लेता और श्वान के लिए भी कुछ न कुछ ले आता।

एक दिन वहाँ एक हाथी आया। पहले तो श्वान उससे डर गया और भौंकने लगा। तब बन्दर ने उसे समझाया -

"हाथी तो बस पत्ते, फल-फूल, रोटी और मिठाई खाता है। तुम्हें उससे डरना नहीं चाहिए।"

तब दोनों ने धीरे धीरे हाथी से दोस्ती कर ली और हाथी भी कभी कभी उन्हें सूँड से उठा लेता और अपनी गर्दन पर बिठा लिया करता।

बहुत दिनों बाद श्वान को वही पुराना सवाल याद आया -

"बुद्धि क्या है?"

तब बन्दर ने उसे समझाया -

"शब्दों को किसी वस्तु से जोड़कर देखने के तरीके को बुद्धि कहते हैं। जैसे "भौं-भौं" मतलब तुम, "खौं-खौं" मतलब "मैं"!"

अब श्वान को बन्दर की कही उस दिन की वह बात समझ में आ गई, जब उसने उसे बताया था कि वह कैसे लोगों की बातों को सुनकर उसका मतलब समझ लेता है। तब श्वान ने तय किया कि अब रह भी मनुष्यों की बातों को ध्यानपूर्वक सुना करेगा। साल भर में श्वान को भी मनुष्यों की बातें समझ में आने लगी। लेकिन उसे यह समझ पाने में अब भी कठिनाई अनुभव हो रही थी कि "बुद्धि" शब्द का क्या मतलब है! बन्दर स्वयं भी अनुभव कर रहा था कि उसे यह शब्द तो पता है किन्तु यह नहीं पता कि यह शब्द किस वस्तु का सूचक है!

"मैं कोई दूसरा तरीका खोजता हूँ।"

- बन्दर ने सोचा।

तब उसे स्पष्ट हुआ कि दो घटनाओं या स्थितियों को एक दूसरे से जोड़कर देखना ही "बुद्धि" या बुद्धि का कार्य है। जैसे -

भूख लगने पर यह जानना कि कुछ खाने से या भोजन करने से भूख से होनेवाली तकलीफ दूर हो जाती है। तो "जानना" ही "बुद्धि" अर्थात् "बुद्धि" का कार्य है। तब उसने सोचा कि हाथी दादा से पूछकर देखें क्या उसे यह पता है!

जब उसने हाथी से पूछा तो हाथी ने कहा -

"जानना" तो इन्द्रियों का कार्य है और एक वस्तु या घटना का दूसरी वस्तु या घटना से क्या संबंध है या हो सकता है यह बुद्धि या बुद्धि का कार्य है।

अब हाथी को मजाक सूझी। उसने बन्दर से पूछा -

"अच्छा बताओ, बुद्धि या बुद्धि के कार्य को कैसे जाना जाता है और कौन इसे जानता है?"

बन्दर को सपने में भी हाथी से ऐसा सवाल सुनने की उम्मीद नहीं थी। जब बहुत देर तक बन्दर सिर खुजलाता रहा तो हाथी बोला "जानना" कोई वस्तु या कार्य नहीं है। "जानना" आत्मा का धर्म  है। "जानना" ही आत्मा है,  और आत्मा ही "जानना" है।

"और मैं?"

"तुम खौं-खौं हो!"

हाथी ने मुस्कराते हुए कहा। 

"नहीं, खौं-खौं तो वैसे ही इस शरीर का नाम है जैसे भौं-भौं उस शरीर का, जिसे श्वान कहा जाता है!"

अब चौंकने की बारी हाथी की थी।

तीनों मित्र बहुत समय तक इसी तरह आपस में बातचीत और हँसी-मजाक किया करते थे। 

आज जब बन्दर और हाथी उसे छोड़कर जा चुके हैं तो श्वान फिर अकेलापन अनुभव कर रहा है। उसे उसके स्वामी की याद आने लगी। पता नहीं वे कब तक लौटेंगे!

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी।।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।

***

 








Tuesday, 16 July 2024

साक्षी वर्तमान है।

इतिहास साक्षी है!

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मैं बहुत असंतुष्ट हूँ। इसलिए नहीं कि मैंने विवाह नहीं किया, बच्चे नहीं पैदा किए। इसलिए भी नहीं कि मैंने अपना 'घर' भी नहीं बनाया। ये चीजें मैंने कभी चाही ही कहाँ थीं! इसलिए भी नहीं कि अपनी युवावस्था में मैं उन तमाम सच्चे-झूठे बाबाओं से मिलता रहा जिसमें अन्त में मैंने व्यर्थ समय गँवाया। बल्कि केवल इसलिए क्योंकि इस दौरान कई ऐसे लोगों से पाला पड़ा, गलतफहमी से जिन्हें मैंने अपना मित्र बना लिया। आधे अधूरे बाबाओं में से अनेक तो दिवंगत हो चुके हैं और मेरे पुराने मित्रों में से भी बहुत से जा चुके हैं। बस लेकिन उन मित्रों के बारे में जरूर लगता है जिन्होंने माया - जैसे कार, आलीशान मकान और गृहस्थों से अध्यात्म या धर्म के बहाने संपत्ति भी पा ली होगी लेकिन अब जीवन लगभग घसीटते हुए खींच रहे हैं। जीवन में उदासी घर कर गई है न भोजन का सुख है, न स्वास्थ्य और उमंग है। चेहरा क्लान्त और निस्तेज है, यद्यपि कभी कभी मिलने के लिए आनेवालों से मिलते समय और वैसे भी प्रायः Men's Parlour  से शरीर और चेहरे को टोन अप करवाते रहते हैं। कई असाध्य रोगों से त्रस्त हैं और अच्छी तरह जानते है कि किसी भी समय  अप्रत्याशित रूप से यहाँ से चले जाना है। मृत्यु के बाद क्या होता होगा, इससे भी अधिक चिन्ता और निराशा उन्हें जीते जी इसलिए भी है क्योंकि शरीर जर्जर, दुर्बल और रुग्ण है। लोग भी जानते हैं लेकिन क्या कर सकते हैं? तो मैं क्यों असन्तुष्ट हूँ? 

क्योंकि मैं जानता हूँ कि उनके इर्द-गिर्द जमा होनेवाले लोग उनके हितैषी हरगिज़ नहीं हैं। वे अपने आप तक के हितैषी नहीं हैं। वर्षों से साथ रहते हुए बस एक आदत भर हो गई है, रोज रोज मिलते रहने की।

सब के सब उनसे इसलिए मिलते रहते हैं क्योंकि उन सब के जीवन में एक रिक्तता, एक अभावात्मकता भरी हुई है। और इस अभावात्मकता और रिक्तता को भरने के लिए ही उनके पास आया करते हैं। दो या दो से अधिक शून्य परस्पर मिलकर क्या किसी के जीवन में भराव ला सकते हैं? हर कोई अपने खालीपन को भरने के लिए मनोरंजन का सहारा लेता है मनोरंजन हमें मूढ बना देता है। मनोरंजन तो एक विष ही है। तथाकथित सत्संग लोग इसीलिए करते हैं ताकि अपनी काल्पनिक लालसाओं को पूर्ण कर सकें। इसे हम आध्यात्मिक उन्नति कहते हैं। क्या आप नहीं देखते कि बाबा लोग कैसे बड़ी से बड़ी भीड़ अध्यात्म और धर्म के नाम पर आकर्षित करते हैं जबकि उन्हें भी पता नहीं होता कि इस सबसे कुछ होना जाना नहीं है बल्कि होता यह है कि सभी एक दूसरे से ऊर्जा खींचते और उसे व्यर्थ करते रहते हैं। इसीलिए मैं असंतुष्ट हूँ। और यह न सोचिए कि हम सब उनसे कुछ अलग हैं।  हम सभी एक दूसरे को निरन्तर और भी अधिक विनष्ट और भ्रष्ट करते जा रहे हैं। यह सब समझने के लिए बुद्धि सूक्ष्म, और प्रखर होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि विवेकयुक्त होना उससे भी कहीं अधिक आवश्यक है। लोभ और भय अज्ञान के ही लक्षण और परिणाम हैं, दोनों ही प्रमाद में ही उत्पन्न, विकसित होते हैं। प्रमाद ही एकमात्र पाप है और विवेक ही एकमात्र पुण्य है। जब तक हम प्रमाद से ग्रस्त हैं, किसी भी प्रकार के काल्पनिक  लोभ और भय से ग्रस्त हैं तब तक हमारे लिए कोई भविष्य, कहीं नहीं है। मेरे घर के आसपास हर घर के बाहर वाहनों और क्रोध की कारें लगी हैं। लोग बड़ी शान से उनका प्रयोग करते हैं। घरों के बाहर सीमा से परे फुटपाथ का अतिक्रमण कर लेते हैं, उन पर भी वृक्ष लगाकर सड़क और भी संकीर्ण कर देते हैं, क्योंकि कार रखने के लिए घर में गैराज नहीं है। लाखों रुपयों के मूल्य की कारों का स्वामित्व होने उन्हें और अधिक विलासप्रिय, आलसी बनाता  है। फिर वे जिम जाते हैं, घर में भी इस प्रकार के उपकरण रखते हैं जिस पर वे व्यायाम कर सकें। 

मैं उनसे और हर किसी से कहना चाहता हूँ, हम सभी अपनी आदतें बदलें, अच्छा और स्वास्थ्यप्रद संतुलित भोजन समय पर करें, नियमित रूप से व्यायाम करें, कृत्रिम उपायों से प्राप्त होनेवाली सुख सुविधाओं, समस्त भौतिक यन्त्रों को प्रयोग करना पूरी तरह से छोड़ दें, लोगों से मिलना जुलना कम से कम और आवश्यक होने पर ही करें। प्रकृति से प्राप्त स्वाभाविक जीवन-क्रम जीवन में अपनाए। सरलता से जियें और शास्त्रचर्चा, प्रवचन या उपदेश आदि लेने देने से परहेज करें। लेकिन मेरी इन बातों पर कोई कभी ध्यान तक नहीं देता। इसलिए मैं दुःखी तो नहीं किन्तु असन्तुष्ट भर अवश्य हूँ। 

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Monday, 27 May 2024

कथं!

संस्कृतम्

नाहं कश्चिन्न मम किञ्चन्।।

कथं वदेऽहं द्वैताद्वैतम्।।

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Tuesday, 16 April 2024

What is X?

X

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A very cryptic letter originated from the Sanskrit letter / word क्ष - indicating loss and destruction even annihilation in a way.

Presently this is the well-known icon of the Twitter. Then there is a movement that is gaining momentum in the Islamic World -

The Ex-Muslims.

Again there is the "Facebook" owned by Mark Zuckerberg. No need to comment on him.

The three "Abrahmic Traditions" describe "Exodus" in different ways.

The first was of those who were expelled out of Egypt, when Moses and his tribe namely the Jew were accused of having done two crimes one of killing a cow, and the other stealing Gold from Pharaoh's treasure. Purportedly He was the trying to find out the land of Jehovah / Israel when a luminous  column of Light appeared before him. This column was none other than तेजोलिङ्ग of  ईश्वर / शिव  and the abode of  शिव / ईश्वर  was verily the ईश्वरालय / Israel .

There was a cloud casting it's shadow upon Him and his tribe in the scorching sunlight of the desert. This cloud was none other than  इन्द्र / Indra - The king of heavens where Deva / live.

Then there was The Arch Angel / आर्ष अङ्गिरा / another name / form / epithet of  जाबाल ऋषि / aka Arch-Angel protecting and directing the tribe of Jehovah.

It's no surprise because  Jehovah /  यह्वः is the same as रुद्र / गणेश / स्कन्द / यम / वरुण / बृहस्पति /  सूर्य / इन्द्र  according to the 5 prominant and major अथर्वशीर्ष atharvasheerSha text,  The Father Principle "shiva" Himself. 

He is verily the Conscious Light that was seen by Moses and His tribe. Indra was accompanying them alongwith the sage - JAbAl rShi / जाबाल ऋषि.

Arch-Angel Gabriel is but cognate of  जाबाल ऋषि  only.We can also see how the word - Angel resembles with, and is cognate of the word  अङ्गिरा .

शिव  appeared before Moses in the luminous firm of the तेजोलिङ्ग and in the background was Indra / इन्द्र  protecting them in the form of a big cloud in the sky.

Then there Moses saw a cool fire / light in a bush on their way to  ईश्वरालय / Israel .

जाबाल ऋषि / Arch Angel Gabriel was also there as the medium and the witness, Who told to Moses  :

"Far away from here there is the abode of  शिव / ईश्वर, who you saw in the form of  तेजोलिङ्ग / a luminous column of Light before your very own eyes!

Now listen / read this :

JAbAl rShi recited the sacred mantra of  शिव / Shiva, and asked Moses to repeat the same in voice. As Moses was a complete illiterate, The sage told him : ब्रूहि! 

ब्रूहि in the Sanskrit means : speak! 

There was how the word somehow written by Moses in his own script from - Right to Left.

This was how Hebrew came into existence. 

As  शिव / shiva and skanda are one and the  same --

Supreme Ishwara - the Father Principle, JAbAl rShi gave to Moses the ensignia as  the mark which bears resemblance with two triangles, one placed over another. This is also the mark of  स्कन्द / skanda - as  the Vedika devatA.

It's not just imagination, but there is enough and ample evidence too to think of how the first Abrahmic Tradition might have come in the first place.

This didn't absolve the tribe if Moses from the sacrilege  they had committed and for which had been expelled from Egypt.

These three Abrahmic traditions condemn  collectively the idolaters and call them :

Kafir / Kufra,

The word is again cognate of the Sanskrit word : कुप्रः - pointing out something "Wrong".

It's kind of the proverbial case where :

The kettle calls the pot black!

***

So, presently no WWIII is going to take place, even if takes place, the ultimate result will be the same : The End of अधर्म / adharma.

No need to stress the victory of  / धर्म /  Dharma, for Dharma / Sanatana is the only Dharma that always prevails and keeps ever flourishing.

***



 

Monday, 1 April 2024

Fluorescence

And The Phosphorescence.

Fluorescence and Phosphorescence are two ways in which there is though one and the same source of Radiation / Light and when the radiation emitted by the source induces secondary Radiation or Light on the object upon which it falls. In the first case as soon as the Radiation  / Light stops falling upon the object, the secondary Radiation / Light emitted by the object is gone, while in the second case, the object keeps emitting Radiation / Light stays for some more time.

Obviously this Radiation / Light is the same as "Energy" of the kind that the Physics deals with. This is therefore the "Material Light". A "Dynamic Principle".

The "Physical Matter" on the other hand, is the material body of the kind, either in with an inertia associated with it.  That means unless an external influence does not work upon it it remains in the same position either in movement or at rest. 

What is "Consciousness"?

In the study of Matter, Mind, and Life, the three attributes namely :

The Inertia (at rest), Inertia in Movement and Knowing are respectively the three interdependent qualities and are called together as "Prakriti".

The above analogy could be explained better by means of the following verse 22 of Gita, Chapter 14 :

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।।

न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि निवृत्तानि न काङ्क्षति।।२२।।

However, Gita chapter 14 beautifully narrates the verse 1 onwards as :

श्रीभगवानुवाच  --

परं भूयं प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।।

यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।१।।

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।।

सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।।२।।

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्।।

संभव सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।३।।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।।

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता।।४।।

स्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।५।।

We could compare this phenomenon with Phosphorescence and Fluorescence.

The Prakriti is Life. When the Light of The Supreme falls upon it, this results in animating the Life in two ways. Either as soon as the Light stops falling upon any of the objects - purely a material one or an organism, the Light could stay only for that much time or may continue to shine even when the source had stopped casting it's light on such of any object.

When Consciousness (Light) animates an organism, it turns into the sense "I'm". When Consciousness (Light) falls upon a material object it shines momentarily.

So there is a "Life-span" for an organism but no such thing happens to a material object.

Further :

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम्।।

सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ।।६।।

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।।

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्।।७।।

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहन सर्वदेहिनाम्।।

प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत।।८।।

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।।

ज्ञानमावृत्त्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत।।९।।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।।

रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।१०।।

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते।।

ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।११।।

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।।

रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ।।१२।।

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।।

तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।।१३।।

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।।

तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते।।१४।।

रजसि प्रलये गत्त्वा कर्मसङ्गिषु जायते।।

तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।।१५।।

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्विक निर्मलं फलम्।।

रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्।।१६।।

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।।

प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च।।१७।।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्थाः मध्यं तिष्ठन्ति राजसाः।।

जघन्यगुणवृत्तिस्थाः अधो गच्छन्ति तामसाः।।१८।।

नान्यं गुणेभ्यः कर्त्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।।

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।।१९।।

गुणानेतानतीत्त त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।।

जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।।२०।।

अर्जुन उवाच --

कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।।

कामचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते।।२१।।

श्री भगवानुवाच --

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।।

न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि निवृत्तानि न काङ्क्षति।।२२।।

Was the verse referred to in the beginning. 

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Monday, 18 March 2024

भवप्रत्ययो

विदेहप्रकृतिलयानाम्

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पाञ्जल योगसूत्र १/१९

भाष्य -

विदेहानां = देवानां -- भवप्रत्ययः। ते हि स्वसंस्कार मात्रोपयोगेन चित्तेन कैवल्यपदमनुभवन्तः स्वसंस्कारविपाकं तथाजातीयकमतिवाहयन्ति। तथा प्रकृतिलयाः साधिकारे चेतसा प्रकृतिलीने कैवल्यपदमनुभवन्ति यावान्न पुनरावर्ततेऽधिकारवशाच्चित्तमिति।।

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वैदिक देवताओं या श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १० में जिन विभूतियों का उल्लेख किया गया है वे प्रकृतिलय चित्त हैं जो कि अपने अपने संस्कारम2त्र का उपयोग करते हुए उस चित्त से कैवल्य में स्थित रहते हुए भी सापेक्ष दृष्टि से उन उन संस्कारों के परिपाक होने तक उनका अतिक्रमण हो जाने तक उसका निर्वाह करते हैं। अर्थात् इस प्रकार से वे देवता स्वर्लोक में प्रारब्ध होने तक वास करने के बाद पुनः मृत्युलोक में देहधारी होकर जनाम लेते हैं या नित्यमुक्ति में प्रतिष्ठित हो रहते हैं। क्योंकि उन देवताओं ने उस उपाधि की प्राप्ति कामना से की हुई होती है, और उनकी कामना पूर्ण होने पर और प्रारब्ध का क्षय हो जाने पर भी अन्य कामनाओं के पूर्ण होने तक उनका भोग भी उन्हें करना होता है।

कठोपनिषद् में यमराज नचिकेता से कहते हैं कि तीन प्रकारों की अग्नियों में प्रथम तो स्थूल भौतिक और सूर्य आदि में प्रज्वलित हो रही अग्नि है, दूसरी आधिदैविक वह है जो कि नक्षत्रों में प्रकट और वेदविद्या के रूप में वैदिक देवताओं के रूप में प्रकृति में व्यक्त और अव्यक्त होते रहती है जिसकी उपासना से मनुष्य स्वर्ग आदि की प्राप्ति कर सकता है किन्तु अनित्य होने से स्वर्ग आदि के भोग भी काल के प्रभाव से समाप्त हो जाते हैं, जबकि अग्नि का तीसरा प्रकार अपनी आत्मा का आध्यात्मिक ज्ञान है जिसे प्राप्त कर या जिसे उद्घाटित कर लेने पर पुनः मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से अर्थात् "भव" से और "अप्यय" से रहित उस आत्मा में अवस्थित हो रहता है।

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उपरोक्त विवेचना करने का उद्देश्य यह जानना है कि वेदों में वर्णित देवताओं का स्वरूप कैसा है और यद्यपि सभी की उपासना से अंततः परमात्मा को भी जान लिया जा सकता है किन्तु वे सभी देवता भी प्रारब्ध से बँधे होते हैं, और इस दृष्टि से उनकी सीमित शक्ति और क्षमता होती है। दूसरी ओर पौराणिक देवता वे विभूतियाँ हैं जिनका उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय १० में प्राप्त होता है। --

सिद्धानां कपिलो मुनिः 

के उल्लेख से स्पष्ट है कि देवताओं की एक कोटि वह है जिसे "सिद्ध" कहा जाता है। चूँकि साँख्य सिद्धान्त के अनुसार चेतन पुरुष ही एकमात्र परम तत्व है और वह स्वयं प्रकृति में ही व्यक्त और अव्यक्त होते रहता है, अतः प्रकृति के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, जो कि पुरुष पर ही आश्रित होती है। जिसे इस तत्व का दर्शन हो जाता है उसे "सिद्ध" कहा जाता है और वह भी नित्यमुक्त होने से विभूति और ईश्वरतुल्य ही होता है।

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Monday, 11 March 2024

एक हिन्दी कहानी

खूँटी की आत्मकथा

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उस जंगलनुमा वातावरण में जहाँ कभी कभी मैं इधर उधर यूँ ही घूमा करता था, एक वृद्ध संत या साधुनुमा व्यक्ति रहा करते थे। चूँकि यह कथा 30 वर्षों से भी पहले के समय की है इसलिए उनके बारे मेंं इतना भर कह सकता हूँ कि उनका नाम तो मुझे किसी ने कभी नहीं बतलाया, लेकिन उनका कुलनाम था - "पाठक"। नर्मदा तट पर ओंकारेश्वर मन्दिर से चार सम्प्रदाय मठ की दिशा में और आगे गायत्री मन्दिर से आगे, नर्मदा-कावेरी के दूसरे संगम की तरफ जाते हुए जरा पहले बाईं तरफ उनकी कुटिया थी, जहाँ वे निवास करते थे। वे संभवतः किसी सम्प्रदाय-विशेष में दीक्षित नहीं थे और सरल भाव और शुद्ध हृदय से नर्मदा-तट पर निवास करनेमात्र को ही समर्पित और उसमें ही संतुष्ट प्रतीत होते थे।

जैसा कि प्रचलन था, वहाँ अनेक छोटे-बड़े महात्माओं ने अपने अपने आश्रम स्थापित कर रखे हैं जहाँ उनके भक्त उन आश्रमों में उनसे मिलने प्रायः आते रहते थे। किन्तु मुझे याद नहीं आता है कि पाठक जी से मिलने के लिए किसी को आते हुए मैंने शायद ही कभी देखा हो।

मैं जहाँ रहता था वह स्थान इंदौर के एक महात्माजी ने "माता आनन्दमयी तपोभूमि" के नाम से आश्रम के रूप में स्थापित किया था। आज उन महात्मा या उस स्थान के विषय में मैं अधिक कुछ नहीं जानता।

जब वर्ष 1991 की फरवरी 11 की शाम वहाँ पहुँचा था तो जल्दी ही रात्रि का भोजन कर सो गया था। दूसरे ही दिन महाशिवरात्रि होने से मान्धाता नामक उस पर्वत की परिक्रमा पर चला गया जिसके एक ओर से नर्मदा नदी तथा दूसरी ओर से कावेरी नदी आकर परस्पर मिलती हैं और उनका संगम जहाँ होता है, फिर पुनः पर्वत के दोनों ओर दो भागों में बँट जाती हैं, किन्तु आगे चलकर बाद में पुनः दूसरे संगम में आपस में मिल जाती हैं।

उस दूसरे संगम की दिशा में अकसर सुबह शाम घूमने या स्नान के लिए जाया करता था तो उनसे परिचय हो गया था। ऐसे ही एक दिन उन्होंने अपनी कुटिया पर बुलाया तो वहाँ चला गया। एक छोटा साफ सुथरा कमरा और उससे भी छोटा किचन। शौचालय कहीं नहीं। उन दिनों वहाँ किसी भी आश्रम में केवल वी.आई.पी. अतिथियों या महन्तों के लिए ही व्यक्तिगत शौचालय हुआ करते थे। मैंने उनसे पूछा :

"आपने अपने यहाँ शौचालय क्यों नहीं बनाया?"

तब उन्होंने मुझे यह कथा सुनाई :

ऐसे ही किसी स्थान पर एक महात्मा अपनी एक छोटी सी कुटिया बनाकर रहते थे और भजन करते थे। किन्तु उनके जिस निवास स्थान के दरवाजे पर ताला लगाया जाता था वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे चोर चुरा ले जा सकते थे। बहरहाल वहाँ दीवार पर एक खूँटी अवश्य थी जिस पर वे उनकी कुटिया के दरवाजे पर लगनेवाले ताले की चाबी टाँग दिया करते थे।

एक दिन उनसे मिलने के लिए कोई आगन्तुक जिज्ञासु जब आया तो कौतूहलवश उसने उनसे पूछा :

"बाबाजी, यह चाबी आपके किस काम आती है?"

महात्माजी बोले :

"ऐसा है इस उम्र में मेरी याददाश्त बहुत कमजोर होने लगी है और एक बार जब अपनी इस कुटिया से बाहर चला जाता हूँ तो भूल जाता हूँ कि लौट कर कहाँ जाना है। इस चाबी से मुझे यह स्थान याद रहता है और इसका बस इतना ही काम है।"

"और अगर किसी वजह से चाबी खो जाए तो?"

"हाँ,  यह भी हो सकता है, लेकिन इतने समय से यहाँ बार बार आते रहने से अब पैर भी बहुत अभ्यस्त हो गए हैं, और मैं कहीं भी चला जाऊँ मेरे पैर मुझे स्वयं ही यहाँ खींच ले आते हैं।"

"फिर खूँटी का क्या प्रयोजन है?"

"उसका प्रयोजन यह स्मरण कराना है कि शरीर स्वयं ही वह चाबी है जो कि मनरूपी खूँटी पर टँगी रहती है, और मनरूपी यह खूँटी स्वयं भी किसी ठोस दीवार पर न लगी हो तो शरीर और मन दोनों ही भटक जाते हैं।"

"और वह ठोस दीवार क्या है?"

जिज्ञासु ने प्रश्न किया। 

"वह दीवार है नित्य रहनेवाला स्वाभाविक भान जिसे चेतना भी कहा जाता है।"

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