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Monday, 20 March 2023

प्रीत्यभावेन शब्दादेः

अष्टावक्र गीता

अध्याय १२

श्लोक २

प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः।। 

विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः।।२।।

(प्रीति अभावेन शब्दादेः अदृश्यत्वेन च आत्मनः। विक्षेप-एकाग्र हृदय एवं एव अहं आस्थितः।।)

अर्थ  : शब्द आदि इन्द्रियगम्य संवेदनों के प्रति प्रीति न होने से और चूँकि आत्मा भी दृश्य (इन्द्रिय-मन-बुद्धि आदि के लिए) संवेदनगम्य विषय नहीं है, और इसलिए भी, विक्षेप, एकाग्रता आदि से रहित मैं अपने नित्य अविकारी स्वरूप में अधिष्ठित हूँ।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೨

ಶ್ಲೋಕ ೨

ಪ್ರೀತ್ಯಭಾವೇನ ಶಬ್ದಾದೇರದೃಶ್ಯತ್ವೇನ ಚಾತ್ಮನಃ||

ವಿಕ್ಷೇಪೈಕಾಗ್ರಹೃದಯ ಏವಮೇವಾಹಮಾಸ್ಥಿತಃ||೨||

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Ashtavakra Gita

Chapter 12

Stanza 2

I have no attachment for sound, etc., and the Self also not being an object of perception, I have my mind free from distraction and one-pointed, Even thus do I abide.

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Thursday, 24 November 2022

अहो... एकोऽहं देहवानपि।

अष्टावक्र गीता

अध्याय २

श्लोक १२

अष्टावक्र गीता

अध्याय २

श्लोक १२

अहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानपि।।

क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्यविश्वमवस्थितः।।१२।।

अर्थ :

अहो! आत्मा की महिमा!  आत्मा को नमस्कार है! देह यद्यपि यत्र तत्र आती जाती है, आत्मा संपूर्ण विश्व में वयाप्त है, जो कि  देह में होते हुए भी देह से स्वतंत्र भी है, जो कहीं या आता नहीं!

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೨

ಶ್ಲೋಕ ೧೨

ಅಹೋ ಅಹಂ ನಮೋ ಮಹ್ಯ-

ಮೇಹೋऽಹಂ ದೇಹವಾನಪಿ||

ಕ್ವತಿನ್ನ  ಗನ್ತಾ ನಾಗನ್ತಾ

ವ್ಯಾಪ್ಯವಿಶ್ವಮವಸ್ಥಿತಃ||೧೨||

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Ashtavakra Gita 

Chapter 2

Stanza 12

Wonderful am I! Adoration to Myself, Who, though with a body one, neither come from nor go to anywhere and abide pervading the universe.

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