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Sunday, 14 January 2024

पञ्चपाशानि

अथ आत्मानुसंधानम्

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कः बध्यते केन बध्यते च।  

कः पश्यति केन पश्यति च?

कः संबंधः पशोः पाशयोः च।।

कः पाशबद्धो पाशमुक्तो वा? 

काया हि कायपाशम् वा देहः।।

भुवनं हि कालपाशम् वा जगत्।। 

मनः हि कामपाशम् वा चित्तम्।।

बुद्धिर्हि यमपाशम् वा वृत्तिः।।

प्रकृतिर्हि धर्मपाशम् वा अहम्।।

एतानि पञ्चपाशानि ताभि बद्धो।।

पशुः यो पश्यति पश्यतेऽपि।।

मनो एव बाधति बाधतेऽपि।।

न कोऽपि पशुः न पाशबद्धो।। 

न कोऽपि बद्धो न मुक्तो वा।।

।।इति फलश्रुतिः।।

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Friday, 12 May 2023

बुभुक्षुरिह संसारे

अष्टावक्र गीता

अध्याय १७

श्लोक ५

बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षरपि दृश्यते।।

भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी विरलो हि महाशयः।।५।।

(बुभुक्षुः इह संसारे मुमुक्षुः अपि दृश्यते। भोगमोक्ष-निराकाङ्क्षी विरलः हि महाशयः।।)

अर्थ : यहाँ, इस संसार में भोग की कामना रखनेवाले और मोक्ष की प्राप्ति की कामना रखनेवाले भी दिखलाई पड़ते हैं। किन्तु ऐसा कोई बिरला ही महात्मा होता है, जिसे न तो भोगों की और न ही मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा होती हो।

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माण्डूक्य उपनिषद् गौडपादीय कारिका,

वैतथ्य प्रकरण : ३२

न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः।।

न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता।।३२।।

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ

ಅಧ್ಯಾಯ ೧೭

ಶ್ಲೋಕ ೫

ಬುಭುಕ್ಷುರಿಹ ಸಂಸಾರೇ

ಮುಮುಕ್ಷುರಪಿ ದೃಶ್ಯತೇ||

ಭೋಗಮೋಕ್ಷನಿರಾಕಾಂಕ್ಷೀ

ವಿರಲೋ ಹಿ ಮಹಾಶಯಃ||೫||

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Ashtavakra Gita

Chapter 17

Stanza 5

One desirous of worldly enjoyments and one desirous of liberation are both found in this world. But rare is the great-souled one who is not desirous of either enjoyment or liberation.

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