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Thursday, 22 October 2015

Story -11 / कथा -11,

एक कहानी 
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मेरे इस क़स्बेनुमा शहर में आज भी रावण की एक प्रतिमा है जिसकी पूजा हर रामनवमी पर गाँव के कुछ लोग करते हैं जिस पर दूसरे कई लोग हँसते हैं, कुछ आश्चर्य करते हैं तो कुछ बस मेरी तरह उदासीन भी होते हैं । 
मेरे इस क़स्बेनुमा शहर में जो तब गाँव हुआ करता था, शायद पचास वर्षों बाद ’रावण-दहन’ संपन्न होने जा रहा है । समारोहपूर्वक, जैसा कि देश के और भी बहुत से स्थानों पर होता है ।
जब मैंने कॉलेज में एड्मिशन लिया था, उस साल आखिरी बार मेरे इस शहर में दो हफ़्ते तक ’रामलीला’ होने के बाद ’रावण-दहन’ होनेवाला था । वह कार्यक्रम ’रामलीला’ का ही एक ’अंक’ था ।
रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के भव्य पुतले सज-धजकर गर्वपूर्वक मैदान में खड़े थे ।
’नेताजी’ भी पधार चुके थे, और उनके हाथों में धनुष भी था । वे ’लक्ष्य-संधान’ का पर्याप्त अभ्यास कर चुके थे, और उन्हें भरोसा था कि जिन दस-बीस बाणों की बौछार वे रावण पर करेंगे, उनमें से कोई न कोई अवश्य ही उसे प्रज्वलित कर देगा ।
किन्तु न जाने क्यों बहुत से बाणों के प्रयोग के बाद भी रावण यथावत् शान से खड़ा था ।
नेताजी ने प्रश्नसूचक दृष्टि से अपने सहायक की ओर देखा ।
सहायक ने भी उसी तरह नेताजी को ।
तभी गरजती गूँजती आवाज में रावण बोल उठा :
"तुम मुझ पर बाण नहीं चला सकते!"
यह ऐसी आश्चर्यजनक घटना थी कि नेताजी के होश उड़ गए । वहाँ उपस्थित शेष सारे लोग भी भयभीत हो गए ।
"तुम जानना चाहते हो मेरे और मेरे वंश, कुल, परिवार, समाज और प्रजा, साम्राज्य के नष्ट हो जानने का कारण?"
भीड़ स्तब्ध, विस्मयविमूढ़ होकर सुनती रही ।
"मैं महापण्डित था किन्तु स्त्री के प्रति कुदृष्टि रखना मेरा एकमात्र महापाप था जिसने मेरे समस्त कुल, वैभव और समृद्धि को मिट्टी में मिला दिया ।"
भीड़ स्तब्ध, विस्मयविमूढ़ होकर सुनती रही ।
"हाँ तुम मुझे अवश्य जला सकते हो, एक ही बाण चलाकर, किन्तु बाण वही चलाए, जिसने किसी भी नारी को एक बार भी कभी कुदृष्टि से न देखा हो ।"
लज्जाभिभूत नेताजी के हाथों से धनुष वैसे ही छूट गया जैसे महाभारत-युद्ध के समय शोक-विह्वल अर्जुन के हाथों से कभी छूटा होगा ।
उनके सहायक ने साहसपूर्वक ’अनाउन्स’ किया :
"है कोई यहाँ, जो अपने-आपको बाण चलाने का अधिकार रखने की योग्यता से संपन्न मानता हो?"
भीड़ निरुत्तर, स्तब्ध, विस्मयविमूढ़ होकर सुनती रही ।
तब सहायक ने दोनों हाथ जोड़कर रावण से विनती की :
"हे लंकेश, हमारे अपराध क्षमा करें और कृपया हमें बतलाएँ कि यहाँ उपस्थित पुरुषों में से न सही, नारियों में ही क्या कोई ऐसी है, जो आप पर बाण चला सके?"
"हा ... हा ... हा...!"
रावण के ठहाके से धरती काँप उठी ।
"सुनो! स्त्री मुझ पर बाण कैसे चला सकेगी? नहीं चला सकेगी, इसलिए नहीं क्योंकि वह अबला है और मैं बहुत बलवान, बल्कि केवल इसलिए, क्योंकि उसके लिए सभी पुरुष पुत्रवत् ही हुआ करते हैं । फ़िर चाहे उनमें से कोई मुझ जैसा दुराचारी ही क्यों न हो! ठीक है मुझे जो कहना था कह चुका । इसके बाद भी अगर तुम चाहो तो मेरा दहन कर सकते हो ।"
रोमांचित भीड़ निरुत्तर, स्तब्ध, विस्मयविमूढ़ होकर सुनती रही ।
देर तक एक कठिन, असह्य मौन वहाँ व्याप्त रहा ।
तब रावण ने अपने हाथ से कटार ली और उसे अपने सीने में घोंप दिया ।
भीड़ हा-हा-कार कर उठी । सब रो रहे थे ।
एक विस्फोट हुआ और रावण का पुतला अग्नि की प्रचण्ड ज्वालाओं में धू-धू कर जलने लगा । कुछ ही देर बाद शेष दो पुतले भी अग्नि की भेंट चढ़ गए ।
उस दिन के बाद मेरे शहर में फिर कभी रावण नहीं जला ।
अब, लोग इस घटना को लगभग भूल ही चुके थे, किन्तु कुछ दिन पहले कुछ उत्साही युवा रावण-दहन समारोह के लिए मुझसे ’चंदा’ माँगने आये तो मुझे यह घटना याद हो आई!
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क्षेप्तारं पर्वताग्राणां सुराणां च प्रमर्दनम् ।
उच्छेत्तारं च धर्माणां परदाराभिमर्शनम् ॥
(वाल्मीकि रामायण - अरण्यकाण्ड, सर्ग 32, श्लोक 12)
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