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Wednesday, 30 November 2022

न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा

अष्टावक्र गीता

अध्याय २

श्लोक १८

न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्ता निराश्रया।।

अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्।।१८।।

अर्थ :

आत्मा को न तो बन्धन है और न मोक्ष, (मेरी) भ्रान्ति शान्त हो गई क्योंकि उस भ्रान्ति का आश्रय ही नहीं रहा।

अरे! जगत् मुझमें (आत्मा में ही) अवस्थित होते हुए भी आत्मा में अवस्थित नहीं है (क्योंकि दृश्य जगत् का मुझ आत्मा से भिन्न स्वतंत्र अस्तित्व ही कहाँ है!)

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ಅಷ್ಟಾವಕ್ರ ಗೀತಾ 

ಅಧ್ಯಾಯ ೨

ಶ್ಲೋಕ ೧೮

ನ ಮೇ ಬನ್ಧೋऽಸ್ತಿ ಮೋಕ್ಷೋ ವಾ

ಭ್ರಾನ್ತಿಃ ಶಾನ್ತಾ ನಿರಾಶ್ರಯಾ||

ಅಹೋ ಮಯಿ ಸ್ಥಿತಂ ವಿಶ್ವಂ

ವಸ್ತುತೋ ನ ಮಯಿ ಸ್ಥಿತಂ ||೧೮||

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I have neither bondage, nor freedom. The illusion having lost its support, has ceased. Oh!  The universe though existing in Me, does not in reality so exist.

***

(This reminds Gita Chapter 9, Stanza 4 and 5:

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।। 

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः।।४।।

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।।

भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः।।५।।

***